“कर्तव्य पथ के अमर प्रहरी: सीआईएसएफ के वीरों को नमन”

एटा:- राष्ट्र की सुरक्षा की अभेद दीवार — केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) — ने 23 अक्टूबर 2025 को राष्ट्रीय पुलिस स्मारक, चाणक्यपुरी, नई दिल्ली में श्रीमती बिनीता ठाकुर अपर महानिदेशक ने वरिष्ठ सीआईएसएफ अधिकारियों और कर्मियों के साथ उन अमर शूरवीरों को श्रद्धासुमन अर्पित किए, जिन्होंने कर्तव्यपथ पर अपने प्राणों की आहुति देकर बलिदान का स्वर्णिम अध्याय रचा। यह दिवस मात्र एक औपचारिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा में गूंजता हुआ वह संकल्प है जो हर उस जवान की सांसों में बसता है जिसने कहा — “देश पहले, स्वयं बाद में।”

स्मारक स्थल पर जब शहीदों की अमर गाथा को नमन करते हुए पुष्पांजलि अर्पित की गई, तब वातावरण में एक अद्भुत वीर रस की गूंज व्याप्त हो गई। शौर्य की उस मृदुल परंतु प्रखर सुगंध ने हर उपस्थित व्यक्ति के हृदय में यह स्मरण कराया कि कर्तव्य का पथ कभी सरल नहीं होता, परंतु वही पथ राष्ट्र की सुरक्षा का मेरुदंड बनता है। सीआईएसएफ के जवान, औद्योगिक प्रतिष्ठानों से लेकर हवाई अड्डों, अणु संयंत्रों और बंदरगाहों तक, हर उस स्थल के प्रहरी हैं जहाँ राष्ट्र की धड़कन चलती है।

उनके बलिदान का मूल्य शब्दों में नहीं मापा जा सकता। वे केवल सैनिक नहीं — जीवित राष्ट्रचेतना के प्रतीक हैं। जब कोई सीआईएसएफ का जवान सीमा पर, संयंत्र पर, या भीड़ में खड़ा होता है, तब वह केवल एक व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह भारत की अस्मिता की मूर्त प्रतिज्ञा बन जाता है। यही वह भावना है जो हर भारतीय को यह स्मरण कराती है कि शांति की नींव सदा किसी न किसी के त्याग पर टिकी होती है।

इस अवसर पर उनके साहस, समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा की गाथा को पुनः स्मरण किया गया। शहीदों के परिवारों की आंखों में गर्व और वेदना का संगम था — गर्व इस बात का कि उनके प्रियजन ने राष्ट्र के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया, और वेदना इस बात की कि वह दीपक अब लौ बनकर आकाश में विलीन हो चुका है।

सीआईएसएफ का यह आयोजन केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि नव संकल्प का उद्घोष था — कि संगठन का प्रत्येक सदस्य उन्हीं मूल्यों पर चलेगा जिनकी नींव शहीदों ने अपने रक्त से रखी।

राष्ट्र उन वीरों के आगे मस्तक झुकाता है, जिनकी वजह से हमारा वर्तमान सुरक्षित और भविष्य निश्चिंत है।
उनके लिए यही कहा जा सकता है—

> “जो मिट गए देश की राह में, वो फूल नहीं अंगारे थे,
वो दीप नहीं जो बुझ जाएं, वो सूरज थे जो हमारे थे।”

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