गुस्ताखी माफ़ हरियाणा – पवन कुमार बंसल
देश में एक बार फिर संतों की रिहाई और विशेष सुविधाओं को लेकर बहस तेज हो गई है। संत आशाराम और डेरा सच्चा सौदा प्रमुख राम रहीम अपने-अपने आश्रमों में पहुंच चुके हैं। ऐसे समय में, जब देश को हिंदू राष्ट्र बनने की दिशा में खड़ा बताया जा रहा है, यह सवाल भी उठ रहा है कि ऐसे में हिंदू संत जेल में कैसे रह सकते हैं।
सूरत में आशाराम की वापसी पर ढोल-नगाड़ों के साथ जोरदार स्वागत किया गया। घी के दीपक जलाए गए और उनकी उम्रदराज़ शिष्याओं ने भावुक होकर अपने गुरु का अभिनंदन किया। वर्षों से विरह में रही अनुयायियों की भावनाएं इस आयोजन में साफ दिखाई दीं।
वहीं, राम रहीम की यह पंद्रहवीं बार रिहाई बताई जा रही है। आलोचकों का कहना है कि ऐसे ‘टैलेंटेड एक्टर’ और संत को जेल में रखना मानो हरियाणा सरकार के लिए असहज स्थिति बन जाता है। यही कारण है कि आठ साल की सजा के दौरान राम रहीम 407 दिन की पैरोल या अवकाश पर रह चुके हैं। सरकार पर आरोप लग रहे हैं कि वह शिष्याओं की भावनाओं और उनके विरह को विशेष प्राथमिकता देती रही है।
इन घटनाओं ने देश की न्याय व्यवस्था और शासन की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। नए साल की शुरुआत में इसे कुछ लोग हिंदुत्व के नाम पर दिया गया सबसे बड़ा ‘उपहार’ बता रहे हैं, तो वहीं कई वर्ग इसे कानून के समान व्यवहार के सिद्धांत के खिलाफ मान रहे हैं।
संतों की भूमि भारत और उसकी न्यायिक प्रक्रिया को लेकर उठती ये आवाजें अब सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बन चुकी हैं। सवाल यही है कि क्या यह वास्तव में अमृत काल की तस्वीर है, या फिर व्यवस्था की उन खामियों का आईना, जिन पर अब भी गंभीर मंथन की जरूरत है।
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