पद्मश्री की सिफारिश, पर मंज़िल अधूरी: क्यों सम्मान से दूर रह गए पूर्व डीजीपी निर्मल सिंह?

गुस्ताखी माफ हरियाणा – पवन कुमार बंसल

पद्मश्री पुरस्कार और हरियाणा के सेवानिवृत्त डीजीपी निर्मल सिंह का मामला केवल योग्यता का नहीं, बल्कि व्यवस्था के कई अदृश्य पैमानों को भी उजागर करता है। मनोहर लाल के मुख्यमंत्री रहते हरियाणा सरकार ने निर्मल सिंह की सराहनीय सेवाओं के लिए केंद्र सरकार को उन्हें पद्मश्री से सम्मानित करने का प्रस्ताव भेजा था, लेकिन वह सिफारिश अंततः सिरे नहीं चढ़ सकी।

हकीकत यह है कि पद्मश्री जैसे सम्मानों में केवल मेरिट ही नहीं, बल्कि कई अन्य मानदंड भी भूमिका निभाते हैं। मनोहर लाल की अध्यक्षता में हुई एक कैबिनेट बैठक में मुख्यमंत्री ने तत्कालीन मुख्य सचिव विजय वर्धन से एक आईएएस और एक आईपीएस अधिकारी के नाम की सिफारिश करने को कहा। आईएएस के लिए किन्हीं माथुर साहब और आईपीएस के लिए निर्मल सिंह का नाम सुझाया गया।

जब मनोहर लाल ने कहा कि वे निर्मल सिंह को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानते, तो मुख्य सचिव विजय वर्धन ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अपने पूरे करियर में उन्होंने निर्मल सिंह जैसा बेहतर पुलिस अधिकारी नहीं देखा। यह उस समय के गृह मंत्री अनिल विज का भी बड़प्पन था कि उन्होंने मुख्य सचिव की बात पर कहा—“आपने तो मेरे मुंह की बात छीन ली।”

यह उल्लेखनीय है कि जब निर्मल सिंह डीजीपी थे और अनिल विज विधायक, तब एक थानेदार को रिश्वत लेते हुए स्वयं डीजीपी निर्मल सिंह ने पकड़ा था। उस मामले में अनिल विज की ओर से आई किसी भी सिफारिश को निर्मल सिंह ने स्वीकार नहीं किया।

बकौल निर्मल सिंह, जब उन्होंने इस पर अनिल विज को फोन कर धन्यवाद दिया तो विज ने कहा—“लोग तो काम हो जाने के बाद भी फोन नहीं करते, और आप तो काम होने से पहले ही धन्यवाद देने लग गए।”

यह भी गौरतलब है कि निर्मल सिंह को डीजीपी पद पर भूपिंदर सिंह हुड्डा ने नियुक्त किया था। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने अपराधियों पर कड़ा शिकंजा कसा। वे भेष बदलकर थानों में छापेमारी करते थे, किसी की सिफारिश नहीं मानते थे और कानून के पालन में कोई समझौता नहीं करते थे।

 

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