एक पेड़ मां के नाम, पूरा जंगल पूंजीपतियों के नाम!

  • रिपोर्ट- मनोज कुमार यादव

सरकार और व्यवस्था का यह अजब खेल देखिए—जब बात साधारण आदमी की आती है तो नियम-कानून, शर्तें और पाबंदियों की लंबी लकीर खींच दी जाती है। एक गरीब किसान या आम नागरिक अगर अपने घर के सामने खड़ा पेड़ काटना चाहता है, तो उसे दर्जनों दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, जैसे वह कोई अपराध कर रहा हो। सरकार कहती है—“पेड़ मां के समान हैं, इन्हें बचाना जरूरी है।” लेकिन यही सरकार जब पूंजीपतियों और कॉर्पोरेट कंपनियों को हजारों हेक्टेयर जंगल कौड़ियों के भाव बेच देती है, तो नियम और पर्यावरण की सारी किताबें कचरे की टोकरी में डाल दी जाती हैं।
सवाल उठता है—क्या पर्यावरण बचाना सिर्फ गरीबों की जिम्मेदारी है? क्या जंगल सिर्फ इसलिए बचाए जाएं कि आम आदमी लकड़ी न काट सके, लेकिन वही जंगल लाखों टन कोयला, सीमेंट, खनन और फैक्ट्रियों की भूख मिटाने के लिए पूंजीपतियों को लूट की खुली छूट मिल जाए? सरकारें जनता को उपदेश देती हैं कि “पेड़ लगाओ, पर्यावरण बचाओ”, मगर असलियत में ये नारे सिर्फ आम आदमी के गले में डालकर उसकी जिम्मेदारी बना दिए गए हैं।
पूंजीपतियों के लिए कानून ऐसे मोम बन जाते हैं, जो उनके हाथों की गर्मी से पिघल जाते हैं। करोड़ों की परियोजनाओं के लिए जंगल उजाड़ दिए जाते हैं, नदियां सुखा दी जाती हैं, आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखल कर दिया जाता है। और यह सब “विकास” के नाम पर होता है। असल में यह विकास नहीं, पूंजीपतियों का पेट भरने की लूट है।
जनता को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि सरकारें हमारे और हमारे बच्चों के भविष्य की चिंता करती हैं। सच तो यह है कि उन्हें सिर्फ चुनावी फंड देने वाले उद्योगपतियों की चिंता है। यही कारण है कि गरीब आदमी के हिस्से में सिर्फ एक पेड़ बचाने का उपदेश आता है, और अमीरों के हिस्से में पूरा जंगल समा जाता है।
अगर जंगल मां है, तो उसे क्यों बेचा जाता है? अगर पेड़ हमारी सांसों के लिए जरूरी हैं, तो उन्हें पूंजीपतियों के हवाले क्यों किया जाता है? पर्यावरण की लड़ाई सिर्फ आम आदमी से नहीं, उन लालची उद्योगपतियों और उनकी कठपुतली सरकारों से भी होनी चाहिए, जो पूरे जंगल को नीलाम कर रहे हैं।

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