मोहन भागवत जी “संघ के नेताओं से भिवानी की संस्थाओं को बचाओ “

गुस्ताखी माफ हरियाणा – पवन कुमार बंसल

(हमारे जागरूक पाठक भिवानी के जयकुमार गुप्ता के सौजन्य से)

मैं आज भिवानी में चल रहे एक बहुत बड़ी संस्था के विवाद के बारे में कुछ तथ्य दे रहा हूं।

के.एम. पब्लिक स्कूल, हांसी गेट पर स्थित है। यहां मैं आपको बताऊं कि एक श्री कालीचरण जी थे, जो 60 के दशक से सेठ किरोड़ीमल द्वारा स्थापित ट्रस्ट के अंतर्गत संचालित अलग-अलग संस्थाएं—दो कॉलोनियां, मंदिर, जैन चौक बॉयज स्कूल, घंटाघर बालिका स्कूल, बी.एड. कॉलेज, शिशु विहार स्कूल, घंटाघर पर स्थित मार्केट और अन्य संस्थाएं—बहुत सुचारु रूप से चला रहे थे। भिवानीवासियों को पूरी सुविधाएं मिल रही थीं।

उसी दशक में उन्होंने हांसी गेट पर ही एक सीबीएसई एफिलिएटेड +2 स्कूल खोला, जो चंद दिनों में ही बुलंदियों पर पहुंच गया।

सब कुछ ठीक चल रहा था कि तभी एक ठग, कलकत्ता से भिवानी आया और अपने आपको सेठ किरोड़ीमल का रिश्तेदार बताते हुए सारी संस्थाओं पर कब्जा करने लगा।

मैं यहां एक बात बताना चाहता हूं—अंग्रेज भारत में मुट्ठी भर आए थे और वर्षों राज किया, क्योंकि हमारे ही कुछ गद्दारों ने उनका साथ दिया। जलियांवाला बाग में जो हजारों स्वतंत्र सेनानी गोलियों से भूने गए, वे अंग्रेजों ने नहीं, बल्कि अपने ही लोगों ने निहत्थों पर गोली चलाकर मारे थे।

ठीक वैसे ही इस व्यक्ति ने भी भिवानी में कुछ जयचंद और बिकाऊ लोग ढूंढ लिए और संस्थाओं पर कब्जा करने लगा। कालीचरण जी, क्योंकि सेठ किरोड़ीमल के प्रति समर्पित थे, उन्होंने किसी को पैसा नहीं दिया, इसलिए उनका साथ किसी ने नहीं दिया।

के.एम. स्कूल सबसे ज्यादा चर्चा में था, क्योंकि उसमें आमदनी थी। इसने कुछ लोगों के साथ मिलकर स्कूल पर कब्जा कर लिया। बाद में वही कब्जाधारी खुद मालिक बन बैठे। फिर कालीचरण जी को भी कुछ लोगों ने संपर्क किया और उनके साथ मिलकर उन्होंने दोबारा कब्जा कर लिया।

दोनों पक्षों का केस जिला रजिस्ट्रार से होता हुआ डायरेक्टर जनरल, चंडीगढ़ तक पहुंच गया।

मेरे पास कालीचरण जी आए और कहा—“यदि कुछ मदद कर सको तो इसको भिवानी से निकलवाओ, नहीं तो यह सारी संस्थाओं को औने-पौने दाम पर बेच देगा।”

मैंने पूछा—यह किस हैसियत से आया है?
बताया गया कि यह सेठ के दोहते का दामाद है और उन्हें ब्लैकमेल कर बैठा है।

ट्रस्ट, क्योंकि रायगढ़ में रजिस्टर्ड है, तो केस वहीं चल रहा है। वहां ये लोग मैनिपुलेट करते हैं। रायगढ़ में ट्रस्ट की संपत्ति को बेच-बेचकर बेरहमी से पैसा लुटाया जा रहा है और फैसला नहीं होने दिया जा रहा।

2016 में भिवानी उपायुक्त को सरकार ने इसका प्रशासक लगा दिया। प्रशासक ने अपनी सहायता के लिए पांच लोगों की कमेटी बनाई, जिसमें मैं भी एक सदस्य था।

स्कूल को सबने मिलकर संभालना शुरू किया। तब यह व्यक्ति फिर कोशिश करने लगा। मेरे पास भी आया, मैंने इसे लताड़कर भगा दिया।

इसके साथ एक और फ्रॉड था, जिसे इसने सेक्रेटरी बना रखा था। वह डिस्प्यूटेड प्रॉपर्टी—जैसे स्टेशन के पास हलवासिया धर्मशाला, बगिची, बंद पड़ी हवेली आदि—की खरीद-फरोख्त करता था। थाने-तहसील में उसके संपर्क मजबूत थे।

इसने इस ठग को एक कदावर आरएसएस व्यक्ति से मिलवाया और हमें स्कूल से निकलवाने की बात की। डील क्या हुई, हमें नहीं पता। हां, उसकी पत्नी को एक बालिका स्कूल, जिसमें 40-50 बच्चे थे, का प्रिंसिपल लगा दिया गया। सुना है 50 हजार रुपये महीना तय हुआ।

यह भी चर्चा थी कि जल्द से जल्द डीसी को हटवाकर उसकी पत्नी को प्रशासक बनवाने की योजना थी।

हमने तो सुना था कि आरएसएस में बहुत संस्कारी लोग होते हैं, पर यह नहीं पता था कि कुछ बिकाऊ भी हो सकते हैं।

कमेटी भंग करवाने में ये कामयाब हो गए। उस संघी ने मुख्यमंत्री को मेरे बारे में बहुत ही अशोभनीय आरोप लगाए। मगर उनकी पत्नी को पोस्टिंग नहीं मिली। घंटाघर वाला बालिका स्कूल भी बंद कर दिया गया, जो इनके एजेंडे में था, क्योंकि इनका मकसद प्रॉपर्टी बेचना था।

भिवानी वाले ठग ने इस कलकत्ता वाले ठग को एक बड़े और पढ़े-लिखे ठग से मिलवाया। स्कूल छोड़कर बाकी संस्थाएं इनके हाथ में थीं। किरायेदारी बदलने पर लाखों रुपये बनते थे। पैसे की कमी नहीं थी।

यह नया ठग भी अनुभवी था। 1987 में जब चौ. Devi Lal की सरकार बनी और बाद में Banarsi Das Gupta मुख्यमंत्री बने, तब यह उनका करीबी बना हुआ था। इसने टी.आई.टी. मिल के पास एक जोहड़ की जमीन को लेकर एक मशहूर ग्वार फैक्ट्री पर केस कर दिया, जिसमें बिरला जी और एक विदेशी कंपनी की हिस्सेदारी थी। दबाव में आकर फैक्ट्री ने 1987-88 में 40-50 लाख रुपये दे दिए।

इसका पुराना धंधा यही था। इसने हाथ मिला लिया। आदर्श कॉलेज पर भी कब्जा करने की कोशिश की, पर सफल नहीं हुआ।

फिर इसने नया तरीका निकाला। दो वकीलों को साथ लेकर सैकड़ों किरायेदारों को नोटिस भेजने शुरू कर दिए और ट्रस्ट से नोटिस फीस के नाम पर मोटी रकम वसूलने लगा। केस डालकर फीस के नाम पर लूट शुरू कर दी।

हर साल सेशन शुरू होते ही 30-40 लाख रुपये किताबों में खा जाते हैं।

2022 में जब डीसी बदला, तो रजिस्ट्रार से मिलकर स्कूल टेकओवर कर लिया गया। बाद में स्थानीय विधायक को पता चला तो सरकार से बात कर भिवानी के एडीसी (आईएएस) को प्रशासक लगवाया गया।

फिर भी खेल बंद नहीं हुआ। वही संघ वाला व्यक्ति फिर सक्रिय कर दिया गया।

2020 में भी हलवासिया स्कूल में प्रशासक हटाकर मैनेजमेंट आई थी और उस संघी की पत्नी को प्रिंसिपल बनाया गया था। कार और अन्य सुविधाएं दी गईं। बाद में शिकायत हुई और दोबारा प्रशासक आ गया।

अब इन ठगों की फसल पक चुकी थी, मगर ओले पड़ गए। किताबों में 40-50 लाख आने थे, मगर प्रशासक ने मोलभाव शुरू कर दिया।

हमारे समय में आधे से भी कम दाम में किताबों के सेट मिलते थे।

मैं आज भी शपथपत्र देने को तैयार हूं कि एनसीईआरटी की किताब छोड़कर कोई भी भिवानी स्कूल जिस रेट पर किताबें बच्चों को देता है, मैं उससे कम से कम 25% कम में दिलवा सकता हूं, जबकि किताबों के व्यवसाय से मेरा कोई संबंध नहीं।

हमारे समय में शिक्षकों को ग्रेड और प्रमोशन दिए गए। फोर्थ क्लास स्टाफ को डीसी रेट और ड्रेस आदि सुविधाएं दी गईं। हमें लगभग 7-8 करोड़ की एफडी मिली थी, जिसे जस का तस सुपुर्द किया। अब सुनने में आया है कि वह खत्म हो चुकी है और लोन भी लिया गया है।

अब उम्मीद है कि यदि जांच निष्पक्ष हुई तो पहले दो ठग—कलकत्ता वाला और डिस्प्यूटेड प्रॉपर्टी वाला—कानून के शिकंजे में जरूर आएंगे।

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