- रिपोर्ट: मंजय वर्मा
मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश — पितल नगरी और मां विन्ध्यवासिनी के शक्तिपीठ के लिए प्रसिद्ध मिर्जापुर एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार मुद्दा है — मंडलीय चिकित्सालय में हाल ही में शुरू की गई सिटी स्कैन मशीन, जो मरीजों के लिए राहत की किरण थी, लेकिन कुछ ही दिनों में खराब होकर अब सवालों के घेरे में है।
इस सिटी स्कैन मशीन का उद्घाटन केंद्रीय मंत्री एवं मिर्जापुर की सांसद श्रीमती अनुप्रिया पटेल के प्रयासों से हुआ था। इससे गरीब मरीजों को मुफ्त में सुविधा मिलने लगी थी, जबकि निजी केंद्रों पर यही जांच 2500 से 3500 रुपये में होती है। लेकिन ये सुविधा “चार दिन की चांदनी” साबित हुई। कुछ ही दिनों में मशीन बंद हो गई और मरीजों को बार-बार अस्पताल से यह कहकर टरकाया जाने लगा कि “अभी काम नहीं हो रहा है, अगले हफ्ते आइए।”
कमीशनखोरी या लापरवाही?
सूत्रों के अनुसार, मामला सिर्फ तकनीकी खराबी का नहीं बल्कि भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी का है। आरोप हैं कि अस्पताल प्रबंधन जानबूझकर मरीजों को निजी सिटी स्कैन केंद्रों की ओर भेज रहा है, जहां जांच के नाम पर भारी वसूली की जा रही है। सवाल यह उठता है कि लाखों रुपये की लागत से खरीदी गई मशीन इतनी जल्दी कैसे खराब हो सकती है? क्या यह वाकई में खराब है या चालाकी से इसे बंद रखा गया है?
मेडिकल कॉलेज की चुप्पी
गौरतलब है कि यह चिकित्सालय मिर्जापुर मेडिकल कॉलेज के अधीन आता है, लेकिन प्रबंधन की ओर से अब तक कोई स्पष्ट बयान सामने नहीं आया है। मरीजों की परेशानी दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है और जिम्मेदार अधिकारी मौन साधे बैठे हैं। यह चुप्पी खुद में एक बड़ा सवाल है।
शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी
इस पूरे प्रकरण ने स्वास्थ्य सेवाओं की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल खड़े कर दिए हैं। शासन को चाहिए कि इस मामले की उच्च स्तरीय जांच कराए और यदि कमीशनखोरी की बात सामने आती है, तो दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए।
जनता की पुकार
मिर्जापुर के मरीज आज हताश हैं, लेकिन उनकी आवाज को दबने नहीं देना चाहिए। अब समय है कि जनप्रतिनिधि, समाजसेवी और मीडिया इस मुद्दे को मजबूती से उठाएं। स्वास्थ्य सेवा कोई एहसान नहीं, जनता का हक है और उसे कोई भी भ्रष्ट तंत्र छीन नहीं सकता।
मिर्जापुर मंडलीय चिकित्सालय में सिटी स्कैन मशीन का अचानक बंद होना स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही और सिस्टम में व्याप्त भ्रष्टाचार का आईना है। यह मुद्दा सिर्फ मशीन का नहीं, बल्कि मरीजों के जीवन और अधिकार का है।
शासन-प्रशासन को चाहिए कि वह तुरंत हस्तक्षेप कर न केवल मशीन को चालू करवाए, बल्कि दोषियों को सजा भी दिलवाए।
मरीजों की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है — और उसमें भ्रष्टाचार के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए।
