डायबिटीज की दवाओं पर बड़ा खुलासा: टाइप-2 मरीजों के लिए खतरा बन सकती हैं सालों से इस्तेमाल हो रही दवाएं
भारत में तेजी से बढ़ते डायबिटीज के मामलों के बीच एक चौंकाने वाली खबर सामने आई है। वर्षों से टाइप-2 डायबिटीज के इलाज में इस्तेमाल हो रही दवाओं को लेकर वैज्ञानिकों ने गंभीर चिंता जताई है। हालिया मेडिकल रिसर्च ने इस बात की ओर इशारा किया है कि ये दवाएं लंबे समय में मरीजों की स्थिति को बेहतर बनाने के बजाय और बिगाड़ सकती हैं।
आज डायबिटीज एक वैश्विक महामारी का रूप ले चुकी है। भारत को दुनिया की ‘डायबिटीज कैपिटल’ कहा जाता है, जहां बीते कुछ दशकों में मरीजों की संख्या में तेज़ी से इजाफा हुआ है। खराब जीवनशैली, असंतुलित खानपान और जेनेटिक कारणों ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। आमतौर पर टाइप-2 डायबिटीज को नियंत्रित करने के लिए दवाओं और डाइट पर निर्भर रहना पड़ता है, लेकिन अब इन्हीं दवाओं पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
स्पेन की यूनिवर्सिटी ऑफ बार्सिलोना के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक शोध में यह दावा किया गया है कि टाइप-2 डायबिटीज में दी जाने वाली सल्फोनिल्यूरिया वर्ग की दवाएं उतनी सुरक्षित नहीं हैं, जितना अब तक माना जाता रहा है। इस शोध के अनुसार, ये दवाएं शरीर में इंसुलिन बनाने वाली बीटा कोशिकाओं को स्थायी नुकसान पहुंचा सकती हैं।
डायबिटीज, ओबेसिटी एंड मेटाबॉलिज्म जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन का नेतृत्व प्रोफेसर एडुआर्ड मोंटान्या ने किया। शोध में खास तौर पर ‘ग्लाइबेनक्लामाइड’ दवा का अध्ययन किया गया। वैज्ञानिकों का कहना है कि लंबे समय तक इन दवाओं के इस्तेमाल से बीटा कोशिकाएं जीवित तो रहती हैं, लेकिन धीरे-धीरे इंसुलिन बनाना और छोड़ना बंद कर देती हैं। इसके पीछे उन जीनों की सक्रियता में कमी को जिम्मेदार माना गया है, जो इंसुलिन उत्पादन के लिए आवश्यक होते हैं।
सल्फोनिल्यूरिया श्रेणी की दवाओं का इस्तेमाल 1950 के दशक से किया जा रहा है। इनमें ग्लिमेपिराइड, ग्लिपिज़ाइड और ग्लाइब्यूराइड जैसी दवाएं शामिल हैं, जो तुरंत ब्लड शुगर को कम करने में प्रभावी मानी जाती हैं। इसी वजह से दशकों से डॉक्टर इन्हें मरीजों को लिखते आ रहे हैं।
हालांकि, शोधकर्ताओं का कहना है कि लंबे समय तक इन दवाओं के सेवन से न केवल इनका असर कम हो सकता है, बल्कि शरीर की प्राकृतिक इंसुलिन बनाने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है। इससे मरीज की स्थिति और जटिल हो सकती है और गंभीर साइड इफेक्ट्स का खतरा बढ़ सकता है।
विशेषज्ञों ने इसे मरीजों और डॉक्टरों दोनों के लिए चेतावनी बताया है। हालांकि, यह भी स्पष्ट किया गया है कि मरीज बिना चिकित्सकीय सलाह के अपनी दवाएं बंद न करें, लेकिन उपचार को लेकर अधिक सतर्कता और वैकल्पिक विकल्पों पर विचार करना अब बेहद जरूरी हो गया है।
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Disclaimer: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है. इस तरह की किसी भी जानकारी पर अमल करने से पहले डॉक्टर या किसी विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें
