गुस्ताखी माफ़ हरियाणा – पवन कुमार बंसल
फरीदाबाद।देश हित और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भांग की खेती को कानूनी मान्यता दिए जाने की मांग एक बार फिर तेज हो गई है। हमारे जागरूक पाठक जयभगवान हुड़ा के सौजन्य से सामने आए तथ्यों के अनुसार भांग का पौधा वह “ब्रह्मास्त्र” साबित हो सकता है, जो प्लास्टिक संकट और पेट्रोलियम पर निर्भरता को काफी हद तक समाप्त कर सकता है।
बताया गया कि अमेरिका और कनाडा जैसे देशों में भांग की खेती को कानूनन मान्यता दी जा चुकी है, जबकि उत्तराखंड में भी अब इसकी खेती गैरकानूनी नहीं रही है। भांग के पौधे से 1200 से अधिक उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं, जिनमें प्लास्टिक के विकल्प, कपड़ा, पैकिंग मटेरियल, चूना और भांग के मिश्रण से बना कंक्रीट जैसा मजबूत निर्माण सामग्री, वाहनों के लिए तेल, आयुर्वेदिक दवाएं सहित कई उपयोगी वस्तुएं शामिल हैं।
जानकारों का कहना है कि भांग का पौधा भारत में खेतों में स्वाभाविक रूप से उग आता है और इसकी फसल मात्र छह महीने में तैयार हो जाती है। आयुर्वेद में इसके सीमित और सही उपयोग को अपच, गैस, कब्ज, भूख न लगना तथा घाव पर लेप के रूप में भी उपयोगी माना गया है।
उल्लेखनीय है कि 1950 के दशक तक भांग की खेती देश में कानूनन मान्य थी, लेकिन बाद में नशा माफिया, मेडिकल माफिया और पेट्रोलियम माफिया के दबाव में सरकारों द्वारा इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि भांग का पौधा विश्व को कच्चे तेल के दुष्चक्र से बाहर निकालने की क्षमता रखता है।
मांग की जा रही है कि उत्तराखंड, अमेरिका और कनाडा की तर्ज पर भारत के अन्य राज्यों में भी भांग की खेती को कानूनी मान्यता दी जाए। यदि ऐसा होता है तो किसानों की आय में वृद्धि, उपभोक्ताओं को सस्ते और टिकाऊ उत्पाद तथा प्रकृति को बड़ा लाभ मिल सकता है। वर्तमान में इसके गैर-नशीले बीज अमेरिका सहित अन्य देशों से आयात किए जा रहे हैं, जबकि सरकार यदि देश में ही इनके उत्पादन पर ध्यान दे तो आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिल सकता है।
विशेष रूप से पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में, जहां रसायनयुक्त और कैंसरकारक फसलों का प्रभाव बढ़ रहा है, भांग की खेती एक सुरक्षित और पर्यावरण अनुकूल विकल्प बन सकती है। जागरूक नागरिकों का कहना है कि अब समय आ गया है जब सरकार इस दिशा में गंभीर निर्णय लेकर देश, किसान और प्रकृति के हित में ठोस कदम उठाए।
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