हम जो चीजें अपनी सेहत बेहतर करने के लिए खा रहे हैं, अगर वही हमारे शरीर को नुकसान पहुंचा रही हों तो? एक नए शोध ने भारत समेत दुनिया की फूड चेन को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। दावा किया गया है कि खेत से थाली तक पहुंचने की प्रक्रिया में खाद्य पदार्थ दूषित हो रहे हैं, जिससे कई बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं।
नई सीरीज ‘जरा सोचिए’ में आज हम इसी महत्वपूर्ण मुद्दे पर रिपोर्ट पेश कर रहे हैं।
क्या कहता है नया शोध?
ग्लोबल वेलनेस (आयुष) और फूड सेफ्टी एक्सपर्ट डॉ. नवल कुमार वर्मा (MD होम, Hon PhD डॉक्टर ऑफ साइंस) के शोध के अनुसार भारत में रोजाना उपभोग किए जाने वाले कई खाद्य पदार्थ गुणवत्ता और पोषण के मानकों पर खरे नहीं उतर रहे। दूध, पनीर, मसाले, सब्जियां, अंडे, मीट, मछली और पैकेज्ड फूड में मिलावट, केमिकल रेसिड्यू और नियामकीय निगरानी की कमी सामने आ रही है।
शोध के मुताबिक, फूड कंटैमिनेशन अब कुछ प्रोडक्ट्स तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक सिस्टमैटिक समस्या बन चुका है।
खाने में तीन बड़ी समस्याएं
केमिकल और एंटीबायोटिक रेसिड्यू – खाद्य पदार्थों में हार्मोन, एंटीबायोटिक्स, माइक्रोबियल टॉक्सिन और इंडस्ट्रियल एडिटिव्स पाए जा रहे हैं।
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड डाइट – ज्यादा कार्बोहाइड्रेट, ट्रांस फैट और सोडियम से भरपूर प्रोसेस्ड फूड का बढ़ता चलन।
रेगुलेटरी निगरानी की कमी – सप्लाई चेन के हर स्तर पर नियंत्रण और ट्रैकिंग की कमजोर व्यवस्था।
किन बीमारियों का बढ़ रहा खतरा?
WHO, ICMR और अन्य पब्लिक हेल्थ एजेंसियों के अनुसार असुरक्षित भोजन नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज (NCDs) जैसे मोटापा, डायबिटीज, हृदय रोग, इनफर्टिलिटी और कैंसर से जुड़ा है।
नॉन-वेज फूड में मिलावट के वैज्ञानिक संकेत
अंडे: एंटीबायोटिक रेसिड्यू, हार्मोनल ग्रोथ प्रमोटर, साल्मोनेला और ई.कोलाई संक्रमण का खतरा।
पोल्ट्री और मीट: अनियंत्रित एंटीबायोटिक उपयोग, स्लॉटर हाइजीन की कमी और केमिकल प्रिजर्वेटिव।
मछली और सीफूड: फॉर्मेलिन, अमोनिया और मरकरी जैसे हेवी मेटल्स की मौजूदगी।
प्रोसेस्ड नॉन-वेज फूड: सॉसेज, नगेट्स और फ्रोजन मीट में ट्रांस फैट और सोडियम की अधिक मात्रा।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) को वैश्विक स्तर पर शीर्ष सार्वजनिक स्वास्थ्य खतरों में शामिल किया है।
जिम्मेदार कौन?
विशेषज्ञों के अनुसार समस्या खेती के इनपुट, पशु चारे, इंडस्ट्रियल प्रोसेसिंग, कोल्ड स्टोरेज और रिटेल हैंडलिंग तक फैली हुई है। पूरी सप्लाई चेन में संरचनात्मक कमजोरियां मौजूद हैं।
दुनिया कैसे कर रही मुकाबला?
कई देशों में फूड ट्रेसेबिलिटी सिस्टम, एंटीबायोटिक रेसिड्यू की सख्त निगरानी, रियल-टाइम फूड रिकॉल सिस्टम और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की मार्केटिंग पर नियंत्रण जैसे कदम उठाए गए हैं।
कैसे बचें?
मौसमी और स्थानीय खाद्य पदार्थों को प्राथमिकता दें।
कम से कम प्रोसेस्ड और ताजा भोजन चुनें।
पैकेज्ड और प्रोसेस्ड मीट का सेवन सीमित करें।
अधिक रिफाइंड और हाई-कार्ब पैकेज्ड फूड से बचें।
आयुष और आधुनिक पोषण विज्ञान के संतुलन को अपनाएं।
‘जरा सोचिए’ सिर्फ एक रिपोर्ट नहीं, बल्कि जागरूकता की पहल है। सवाल सिर्फ स्वाद या सुविधा का नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की सेहत का है। अब वक्त है यह सोचने का कि हमारी थाली में परोसा जा रहा खाना हमें पोषण दे रहा है या बीमारी।
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