गुस्ताखी माफ़ हरियाणा —पवन कुमार बंसल
पत्रकार खबरों के पीछे,ख़बरें बंसल के पीछे —श्री प्रभाष जोशी, प्रधान संपादक जनसत्ता
क़िस्सा आज से क़रीब उनतालीस साल पहले का है। श्री प्रभाष जोशी ने मुझे जनसत्ता, चंडीगढ़ में वरिष्ठ संवाददाता नियुक्त किया था। 1987 के विधानसभा चुनाव की रिपोर्टिंग करने के बाद मैं अपनी ससुराल नरवाना में दो दिन की छुट्टी बिता रहा था।
दोपहर को गहरी नींद में सोया हुआ था। मेरे साले रवि भूषण ने जगा कर बताया कि नरवाना विधानसभा हलके में वोटों की गिनती के दौरान फायरिंग हो गई है। मौके पर पहुँचा तो पता चला कि कांग्रेस उम्मीदवार व तत्कालीन मंत्री शमशेर सिंह सुरजेवाला के समर्थकों ने फायरिंग की है।
उस दिन मार्केट बंद थी। एक फोटोग्राफर को घर से लेकर घायलों की फोटो की रील ली। बस में बैठकर शाम को नरवाना से चंडीगढ़ पहुँच गया। उन दिनों मेल भेजने का कोई सिस्टम नहीं था।
अचानक सामने आए श्री प्रभाष जोशी ने पूछा—“पवन, यहाँ क्या कर रहे हो?”
मैंने बताया कि एक खबर लाया हूँ और फोटो भी लाया हूँ।तब जोशी जी ने हमारे चंडीगढ़ के संपादक श्री जितेंद्र बजाज से कहा—
“पत्रकार तो खबरों के पीछे भागते हैं, लेकिन खबरें अपने पवन बंसल के पीछे भागती हैं।”
बता दूँ कि सुरजेवाला साहब मेरे दोस्त थे, लेकिन ख़बर हो तो कोई दोस्ती नहीं। खबर पेज वन पर लगी। जोशी जी मेरी तीन खबरों से खुश होकर मुझे तीन एडवांस इन्क्रीमेंट देकर नियुक्त किया।
मैंने कहा कि मैं देसी आदमी हूँ, रोहतक लगा दो। कहने लगे—“नहीं, चंडीगढ़ में ही रहेगा।”
तब श्री प्रभाष जोशी जी ने कहा था—“पवन, हरियाणा की राजनीति यहाँ के मशहूर लालों— बंसीलाल, भजनलाल और देवीलाल— के इर्द-गिर्द घूमती है और ज़्यादातर पत्रकार भी उनमें से किसी न किसी से प्रभावित रहते हैं। तू किसी से प्रभावित मत होना।”
तब मनोहर लाल का राजनीतिक जन्म भी नहीं हुआ था।
जोशी जी महान थे। चाहे देवीलाल ने मेरी शिकायत हमारे अख़बार के मालिक रामनाथ गोयनका से की हो या सुषमा स्वराज ने— उन्होंने हमेशा मेरा बचाव किया।
आज भी उनका आशीर्वाद मुझे प्रेरणा देता है।
मुनव्वर राणा की पंक्तियों में—
“जब कभी धूप की शिद्दत ने सताया मुझको,
याद आया बहुत एक पेड़ का साया मुझको।
अब भी रोशन है तेरी याद से घर के कमरे,
रौशनी देता है अब तक तेरा साया मुझको।”
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