ईरान-अमेरिका टकराव में पाकिस्तान की मुश्किलें बढ़ीं, दो पाटों के बीच फंसी शहबाज़ सरकार

पश्चिम एशिया के हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। ईरान पर अमेरिका और इज़राइल के संयुक्त हमलों के बाद पूरे क्षेत्र में तनाव चरम पर है। इस संकट का सीधा असर पाकिस्तान पर भी पड़ता दिखाई दे रहा है। पाकिस्तान की सियासी और सैन्य नेतृत्व इस दुविधा में है कि वह इस्लामिक एकजुटता के नाम पर ईरान का खुलकर समर्थन करे या आर्थिक और रणनीतिक हितों को देखते हुए अमेरिका के साथ संतुलन बनाए रखे।

कुछ समय पहले तक वैश्विक राजनीति में संतुलन साधने का दावा करने वाले पाकिस्तानी आर्मी चीफ Asim Munir और प्रधानमंत्री Shehbaz Sharif इस समय दबाव में नजर आ रहे हैं। आइए समझते हैं कि यह पूरा संकट पाकिस्तान के लिए क्यों गंभीर बन गया है।

अमेरिका-ईरान युद्ध पर पाकिस्तान का आधिकारिक रुख

पाकिस्तान ने ईरान के सुप्रीम लीडर Ali Khamenei के एयरस्ट्राइक में मारे जाने की खबरों के बाद अंतरराष्ट्रीय कानूनों के उल्लंघन पर चिंता जताई है। प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने बयान जारी कर कहा कि पाकिस्तान दुख की इस घड़ी में ईरान की जनता के साथ खड़ा है। उन्होंने यह भी कहा कि युद्ध की स्थिति में भी राष्ट्र प्रमुखों को निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए।

हालांकि, अपने बयान में उन्होंने सीधे तौर पर अमेरिका का नाम नहीं लिया और न ही खुलकर अमेरिकी हमलों की निंदा की। इससे पाकिस्तान की संतुलन साधने की कोशिश साफ झलकती है।

पाकिस्तान के अंदर बिगड़े हालात

ईरान पर हमलों के बाद पाकिस्तान के कई शहरों में विरोध प्रदर्शन भड़क उठे। 1 मार्च को कराची में अमेरिकी वाणिज्य दूतावास के बाहर हिंसक प्रदर्शन हुए। हालात काबू करने के लिए गोलीबारी तक करनी पड़ी, जिसमें 20 से अधिक लोगों की मौत की खबर है।

रिपोर्टों के अनुसार कराची में 10, स्कार्दू में कम से कम 8 और राजधानी इस्लामाबाद में 2 लोगों की मौत हुई। कराची में मारे गए अधिकांश लोग दूतावास की सुरक्षा में तैनात सुरक्षाबलों की गोलीबारी में मारे जाने की बात सामने आई है। इन घटनाओं ने पाकिस्तान सरकार की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।

शिया आबादी और जनभावनाओं का दबाव

पाकिस्तान में बड़ी संख्या में शिया समुदाय के लोग रहते हैं। इसके अलावा आम जनता में भी इज़राइल के प्रति नकारात्मक भावनाएं रही हैं। ईरान पर अमेरिका और इज़राइल के हमलों के बाद पाकिस्तान की सड़कों पर दोनों देशों के खिलाफ गुस्सा साफ दिखाई दे रहा है।

ऐसे में अगर पाकिस्तान खुलकर अमेरिका का समर्थन करता है या उसे अपने एयरबेस और लॉजिस्टिक सपोर्ट देता है, तो देश के भीतर व्यापक असंतोष और अशांति भड़क सकती है। वहीं अगर वह अमेरिका को मना करता है, तो उसे वॉशिंगटन की नाराज़गी झेलनी पड़ सकती है। माना जा रहा है कि अगर संघर्ष लंबा चला तो अमेरिका पाकिस्तान से सहयोग की अपेक्षा कर सकता है।

अमेरिका में भी उठी पाकिस्तान के खिलाफ आवाज

कराची में अमेरिकी वाणिज्य दूतावास के बाहर हिंसक प्रदर्शनों के बाद अमेरिका में भी पाकिस्तान के खिलाफ प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। अमेरिकी कार्यकर्ता Laura Loomer ने अमेरिकी विदेश विभाग से मांग की है कि पाकिस्तानियों के सभी वीज़ा, यहां तक कि ग्रीन कार्ड भी रद्द किए जाएं।

लूमर ने सोशल मीडिया पर पाकिस्तान पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि उसने ओसामा बिन लादेन को शरण दी थी और वहां कट्टरपंथ को बढ़ावा दिया जाता है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पाकिस्तान अमेरिका और भारत के लोगों के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा देता है।

दोराहे पर खड़ा पाकिस्तान

मौजूदा हालात में पाकिस्तान की सरकार और सेना नेतृत्व दो पाटों के बीच फंसे दिखाई दे रहे हैं। एक तरफ घरेलू जनभावनाओं और धार्मिक दबाव का सवाल है, तो दूसरी ओर अमेरिका के साथ संबंध और आर्थिक निर्भरता का मुद्दा।

अगर क्षेत्रीय तनाव और बढ़ता है, तो पाकिस्तान के लिए संतुलन बनाना और मुश्किल हो सकता है। आने वाले दिनों में इस संकट पर इस्लामाबाद का रुख न केवल उसकी विदेश नीति, बल्कि आंतरिक स्थिरता के लिए भी निर्णायक साबित हो सकता है।

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