भारत द्वारा इंडस वाटर ट्रीटी (IWT) ;को निलंबित किये जाने के बाद पाकिस्तान को पानी की गंभीर कमी का सामना करना पड़ सकता है — ऐसा चेतावनी देने वाली Ecological Threat Report 2025 में कहा गया है। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि पाकिस्तान की लगभग 80% कृषि भूमि इंडस नदी प्रणाली के पानी पर निर्भर है, इसलिए किसी भी व्यवधान का बड़ा मानवीय और आर्थिक प्रभाव पड़ने की आशंका है।
केंद्रीय कदम और पृष्ठभूमि: भारत ने यह निर्णय अप्रैल 2025 में लिया था — आधिकारिक रूप से संधि को 23 अप्रेल 2025 के आसपास प्रभाव में रखे जाने की खबरें आईं — और उस समय नई दिल्ली ने इसकी जिम्मेदारी सुरक्षा कारणों और Pahalgam आतंकी हमले के बाद उठाए गए क़दमों से जोड़कर बताई। इस फैसले ने दोनों पक्षों के लिए जल-साझाकरण की परंपरागत व्यवस्था को अस्थायी रूप से रोक दिया।
रिपोर्ट का निष्कर्ष और स्टोरेज संकट: Ecological Threat Report 2025 में विश्लेषण है कि पाकिस्तान के पास सिंधु नदी के प्रवाह को समायोजित करने के लिए पर्याप्त जल-स्टोरेज नहीं है — रिपोर्ट के मुताबिक मौजूदा बांधों और जलाशयों में केवल कुछ ही दिनों (रिपोर्ट में लगभग 30 दिनों के रूप में संकेत) तक पानी स्टोर करने की क्षमता मौजूद है, जिससे छोटे-छोटे रुकावटों से भी फसलों और पेयजल आपूर्ति पर भारी असर पड़ सकता है।
छोटे संचालन भी गम्भीर असर डाल सकते हैं: भले ही भारत के पास अभी सिंधु के बहाव को पूरी तरह रोकने का व्यापक इन्फ्रास्ट्रक्चर न हो, रिपोर्ट व मीडिया विश्लेषणों में कहा गया है कि रिज़र्वॉयर फ्लशिंग जैसे छोटे-छोटे एकतरफा संचालन भी downstream क्षेत्रों में तलछट छोड़ने, अस्थायी सूखापन या अचानक बाढ़ जैसी घटनाएँ पैदा कर सकते हैं — और इसी तरह के एक संचालन के बाद मई में चिनाब के कुछ हिस्सों में प्रवाह अस्थायी रूप से प्रभावित हुआ था, जिसका प्रभाव पाकिस्तान के कृषि इलाकों पर देखा गया।
राजनीतिक व भू-क्षेत्रीय निहितार्थ: रिपोर्ट यह भी बताती है कि संधि को निलंबित करने का अर्थ सिर्फ एक द्विपक्षीय कानूनी कदम नहीं है, बल्कि यह क्षेत्रीय अस्थिरता और मानवीय संकट की क्षमता भी बढ़ा देता है। इस विषय पर वैश्विक और क्षेत्रीय दोनों स्तरों पर कूटनीति तथा जल-निगरानी के जरिये समाधान की आवश्यकता पर ज़ोर दिया जा रहा है। कुछ रिपोर्टों में चीन द्वारा पाकिस्तान के लिए मोहमद/अन्य परियोजनाओं के प्रवर्द्धन का भी जिक्र है, जो इस संकट में रणनीतिक तत्व जोड़ता है।
अंतरराष्ट्रीय और स्थानीय चुनौतियाँ: विशेषज्ञों का कहना है कि यदि संधि आगे भी संकटग्रस्त रहती है और बहाव में मनमाने परिवर्तन जारी रहे तो पाकिस्तान की खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और ऊर्जा उत्पादन पर दीर्घकालिक नकारात्मक प्रभाव दिखाई देगा। साथ ही, रिपोर्टों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय और जल-संबंधी संस्थाओं से साझा निगरानी एवं मानवीय-तकनीकी सहायता की आवश्यकता भी उठाई है।
