India–European Union Deal: भारत–यूरोपीय संघ की ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ से वैश्विक राजनीति में हलचल, अमेरिका ने जताई कड़ी आपत्ति

नई दिल्ली।भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच हुए ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते ने वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में नई बहस छेड़ दी है। इस समझौते को यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ करार दिया है। जहां एक ओर भारत और यूरोप इस डील को भविष्य की आर्थिक मजबूती के रूप में देख रहे हैं, वहीं अमेरिका ने इस पर कड़ा ऐतराज जताया है और रूस-यूक्रेन युद्ध से जोड़ते हुए गंभीर आरोप लगाए हैं।

मंगलवार, 27 जनवरी 2026 को घोषित इस समझौते को अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सख्त टैरिफ नीतियों के जवाब के रूप में भी देखा जा रहा है। दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं जहां अमेरिकी टैरिफ वॉर से आशंकित हैं, वहीं भारत ने रक्षात्मक रवैया अपनाने के बजाय आक्रामक रणनीति के तहत ओमान और न्यूजीलैंड के बाद अब यूरोपीय संघ के साथ यह बड़ा मुक्त व्यापार समझौता किया है।

अमेरिका पर निर्भरता होगी कम
गणतंत्र दिवस 2026 के मुख्य अतिथि के रूप में भारत आईं उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने कहा कि यह डील भारत को यूरोप के 27 देशों के विशाल बाजार से जोड़ेगी। इससे भारत की अमेरिका पर व्यापारिक निर्भरता कम होगी और भारतीय निर्यातकों को नए अवसर मिलेंगे।

डील में क्या है खास
वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल के अनुसार यह समझौता बेहद संतुलित है। माना जा रहा है कि इसके तहत 90 प्रतिशत से अधिक वस्तुओं पर लगने वाला आयात शुल्क या तो पूरी तरह समाप्त कर दिया जाएगा या काफी हद तक घटा दिया जाएगा। टैक्स में कमी से कच्चा माल सस्ता होगा, जिससे उत्पादकों और उपभोक्ताओं दोनों को लाभ मिलेगा।

वित्त वर्ष 2025 में भारत और यूरोपीय संघ के बीच लगभग 136.53 अरब डॉलर का व्यापार हुआ था, जिसमें भारत का निर्यात अधिक रहा। यह स्थिति इस समझौते के बाद और मजबूत होने की उम्मीद है।

किन क्षेत्रों को होगा सबसे ज्यादा फायदा
इस डील से भारत के पेट्रोलियम उत्पाद, स्मार्टफोन, वस्त्र, दवाइयां, इंजीनियरिंग गुड्स और आईटी सेवाओं को बड़ा प्रोत्साहन मिलेगा। वहीं यूरोप से भारत आने वाली हाई-टेक मशीनरी, मेडिकल उपकरण और विमानों के पुर्जे सस्ते हो सकते हैं।

समझौते के प्रमुख लाभ
इस समझौते से भारत को यूरोप के करीब 45 करोड़ उपभोक्ताओं तक सीधी और किफायती पहुंच मिलेगी। यूरोपीय कंपनियां भारत के विनिर्माण क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश कर सकती हैं, जिससे लाखों नए रोजगार सृजित होने की संभावना है। मजबूत सप्लाई चेन बनने से चीन जैसे देशों पर निर्भरता भी घटेगी।

चुनौतियां भी कम नहीं
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यूरोपीय कंपनियों की तकनीकी बढ़त के कारण भारत के छोटे और मध्यम उद्योगों को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही कृषि और डेयरी सेक्टर को लेकर भारत हमेशा सतर्क रहता है ताकि स्थानीय किसानों के हित प्रभावित न हों।

अमेरिका की नाराजगी और आरोप
भारत–ईयू डील को लेकर अमेरिका खासा नाराज नजर आ रहा है। अमेरिकी वित्त सचिव स्कॉट बेसेन्ट ने आरोप लगाया है कि यूरोप इस समझौते के जरिए अनजाने में रूस-यूक्रेन युद्ध की फंडिंग कर रहा है। उनका कहना है कि यूरोप भले ही रूस से सीधे तेल नहीं खरीद रहा हो, लेकिन भारत के जरिए वह रूसी तेल का अप्रत्यक्ष लाभ उठा रहा है।

बेसेन्ट के अनुसार भारत रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदता है, उसे अपनी रिफाइनरियों में प्रोसेस करता है और फिर वही रिफाइंड तेल यूरोपीय देशों को निर्यात करता है। इस तरह यूरोप का पैसा अंततः रूस तक पहुंच रहा है, जिससे युद्ध को बढ़ावा मिल रहा है।

अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि रूस को कमजोर करने के लिए भारत पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया गया, लेकिन इसके बावजूद यूरोप ने भारत के साथ यह बड़ी डील कर ली। स्कॉट बेसेन्ट ने कहा, “हमने रूस के ऊर्जा व्यापार को रोकने के लिए कुर्बानियां दीं, लेकिन यूरोप वही तेल भारत से खरीद रहा है जो रूस से आता है। यह खुद के खिलाफ युद्ध लड़ने जैसा है।”

वैश्विक राजनीति में भारत की बढ़ती भूमिका
यह पूरा घटनाक्रम दर्शाता है कि वैश्विक राजनीति में भारत अब एक ऐसी धुरी बन चुका है, जिसके साथ व्यापार करना यूरोप की मजबूरी और जरूरत दोनों है। भारत ने अपनी विदेश नीति से यह स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने आर्थिक हितों की रक्षा करते हुए वैश्विक संतुलन बनाना भली-भांति जानता है, भले ही इसके लिए उसे अमेरिका की नाराजगी क्यों न झेलनी पड़े।

 

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