गाजियाबाद:– मोदीनगर तहसील के ग्राम पतला में जो हो रहा है, वह केवल अवैध कब्जा नहीं, बल्कि सरकारी संपत्ति की खुली लूट, जनस्वास्थ्य से जुड़ा अपराध और प्रशासनिक मिलीभगत का जीता-जागता उदाहरण है। आरोप है कि गांव के कुछ प्रभावशाली लोगों ने सरकारी कुएँ पर कब्जा कर उसे अपने मकान के भीतर शामिल कर लिया, और हद तो तब हो गई जब उसी कुएँ में शौचालय का पाइप डाल दिया गया।
यानी जिस कुएँ का पानी कभी ग्रामीणों की प्यास बुझाता था, आज वही बीमारियों का जहर बन चुका है।
तीन साल से शिकायतें, लेकिन सिस्टम मौन
ग्रामीणों का कहना है कि वे पिछले तीन वर्षों से तहसील, ब्लॉक, स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन तक गुहार लगा चुके हैं, लेकिन हर बार उन्हें सिर्फ आश्वासन मिले, कार्रवाई शून्य रही।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि—
क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे या मौत का इंतजार कर रहा है?
या फिर कब्जाधारियों का रसूख कानून से बड़ा हो चुका है?
पटवारी–लेखपाल की रिपोर्ट या ‘कवर-अप दस्तावेज़’?
मामले में खसरा संख्या 41 और 45, सरकारी नक्शा और दो पटवारियों की रिपोर्ट सामने आई है, जिन्हें ग्रामीण पूरी तरह फर्जी और भ्रामक बता रहे हैं।
आरोप है कि बिना स्थल निरीक्षण, बिना सरकारी रिकॉर्ड की सही जांच और बिना कुएँ की भौतिक स्थिति देखे ऐसी रिपोर्ट तैयार की गई, जिससे सरकारी कुएँ को निजी संपत्ति साबित करने की कोशिश की गई है।
यह सीधा-सीधा सवाल खड़ा करता है—
❓ क्या यह लापरवाही है या सोची-समझी साठगांठ?
जनस्वास्थ्य से खिलवाड़, स्वास्थ्य विभाग गायब
कुएँ में शौचालय का पाइप होने के बावजूद—
जल की जांच नहीं,
मेडिकल कैंप नहीं,
स्वास्थ्य विभाग की कोई रिपोर्ट नहीं।
क्या गांव के लोग इंसान नहीं हैं?
क्या ग्रामीण इलाकों में बीमारी फैलना प्रशासन के लिए सामान्य बात हो गई है?
जिलाधिकारी से मुलाकात, फिर भी भरोसा नहीं
हाल ही में पीड़ित ग्रामीण जिलाधिकारी, गाजियाबाद से मिले और सभी दस्तावेज सौंपे, लेकिन उनका कहना है कि उन्हें अब भी न्याय की बजाय फाइल दबने का डर है, क्योंकि पहले भी ऐसे कई मामलों में जांच कागजों तक ही सीमित रह गई।
यह सिर्फ कुएँ का मामला नहीं है
यह मामला है—
सरकारी संपत्ति हड़पने का,
ग्राम समाज की जमीन पर कब्जे का,
पटवारी–लेखपाल की भूमिका पर सवालों का,
और प्रशासनिक संरक्षण का।
यदि आज एक सरकारी कुएँ को इस तरह निगल लिया गया, तो कल तालाब, रास्ते और स्कूल की जमीनें भी सुरक्षित नहीं रहेंगी।
ग्रामीणों की चेतावनी
ग्रामीणों ने साफ कहा है कि यदि—
जल्द अवैध कब्जा नहीं हटाया गया,
दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं हुई,
और कुएँ के पानी की वैज्ञानिक जांच नहीं कराई गई,
तो वे जनआंदोलन, उच्च न्यायालय और मानवाधिकार आयोग तक जाने को मजबूर होंगे।
अब सवाल यह नहीं कि अवैध कब्जा है या नहीं,
सवाल यह है कि क्या प्रशासन इस एक्सपोज़े के बाद भी चुप रहेगा?
