- रिपोर्ट: हरिश्चंद्र चंद्र
दिसंबर हर वर्ष चुपचाप आता है और बिना किसी औपचारिक विदाई के विदा हो जाता है। न कोई शोर, न कोई घोषणा—पर जाते-जाते वह पूरे वर्ष की स्मृतियाँ हमारे मन में छोड़ जाता है। यह महीना केवल कैलेंडर का अंतिम पन्ना नहीं, बल्कि आत्ममंथन और आत्मावलोकन का अवसर भी होता है।
हम चाहें या न चाहें, दिसंबर हर जीवन में आता है। कभी यह एक ठहराव की तरह प्रतीत होता है, तो कभी जीवन-यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बन जाता है। यह हमें स्मरण कराता है कि जैसे वर्ष धीरे-धीरे बीतता है, वैसे ही जीवन भी निरंतर आगे बढ़ता रहता है—बिना रुके, बिना थमे।
जनवरी से आरंभ हुई हमारी यात्रा कब दिसंबर तक पहुँच जाती है, इसका आभास ही नहीं होता। पीछे मुड़कर देखने पर लगता है मानो पूरा वर्ष एक ही क्षण में सिमट गया हो। इस एक वर्ष में जीवन ने हमें बहुत कुछ दिया भी और बहुत कुछ सिखाया भी—खुशियाँ और दुख, सफलताएँ और असफलताएँ, मिलन और बिछोह, सम्मान और अपमान।
कभी हमने बहुत कुछ पाया, तो कभी सब कुछ खो देने का अनुभव किया। व्यर्थ की चिंताएँ भी रहीं और निरर्थक अहंकार भी। वास्तव में, एक वर्ष में जीवन का कितना कुछ घटित हो जाता है—इसका वास्तविक बोध दिसंबर में ही होता है।
अब प्रश्न यह नहीं है कि क्या बीत गया, बल्कि यह है कि आगे क्या शेष है। समय को लौटाया नहीं जा सकता, किंतु उससे सीखा अवश्य जा सकता है। आने वाला वर्ष केवल एक नया कैलेंडर नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत का संकेत है—नई जनवरी, नई उम्मीदें, नई आकांक्षाएँ और नए सपने लेकर।
धरती वही रहती है, आसमान भी वही रहता है। अंत वास्तव में कहीं नहीं होता; हर अंत अपने भीतर एक नई शुरुआत को समेटे होता है। जैसे कैलेंडर बदलता है, वैसे ही हमें भी स्वयं में परिवर्तन लाना होता है—विचारों में, दृष्टि में और जीवन के प्रति हमारे दृष्टिकोण में।
जीवन की परिपक्वता इसी में है कि हम हर मौसम को सहजता से स्वीकार करें—खिले हुए बसंत को भी और तपते जून को भी; ठिठुरते दिसंबर को भी। ताकि जब जीवन का अपना दिसंबर आए, तो हम उसे संतोष, शांति और कृतज्ञता के साथ विदा कर सकें।
ताकि उस क्षण “अलविदा” कहना बोझ न बने, बल्कि जीवन की एक सुंदर और सार्थक स्मृति बन जाए।
अनुज कुमार सोलंकी
प्रकृति चिंतक एवं कृभको–उत्तर प्रदेश में लेखा विभाग में कार्यरत
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