- रिपोर्ट – मनोज कुमार यादव
एटा: जनपद एटा की सड़कों पर आवारा गौवंश घूमना अब आम बात हो गई है। रोज़ाना यात्रियों को जान का खतरा उठाना पड़ता है, किसान अपनी फसलों को इन मवेशियों से बचाने में परेशान रहते हैं और आमजन प्रशासन की लापरवाही का खामियाजा भुगतते हैं। लेकिन जैसे ही एटा में मुख्यमंत्री का दौरा तय होता है, वही प्रशासन अचानक चौकन्ना नज़र आने लगता है। वातानुकूलित कार्यालय में बैठने वाले अधिकारी सड़कों पर भटकते गौवंशों को हटाने के अभियान में लग जाते हैं, सफाई व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त दिखने लगती है और दिखावे के लिए हर संभव प्रयास शुरू हो जाते हैं।
सवाल यह उठता है कि क्या जनता की सुरक्षा और सुविधा केवल मुख्यमंत्री के आगमन पर ही प्रशासन की जिम्मेदारी बनती है? आम दिनों में यही आवारा पशु दुर्घटनाओं का कारण बनते हैं, किसानों की मेहनत पर पानी फेरते हैं, लेकिन तब प्रशासन को कोई चिंता नहीं होती। यह दोहरा रवैया न केवल जनता की भावनाओं से खिलवाड़ है, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही पर भी गहरे सवाल खड़े करता है।
वास्तविकता यह है कि जिम्मेदारी दिखाने का यह खेल अस्थायी है। मुख्यमंत्री के आने से पहले थोड़े दिनों तक सड़कें चमकती हैं, गौवंशों को हटा दिया जाता है, लेकिन उनके जाते ही हालात फिर जस के तस हो जाते हैं। यह प्रवृत्ति बताती है कि प्रशासन जनता के प्रति नहीं बल्कि सत्ता के प्रति जवाबदेह है।
अगर प्रशासन वास्तव में अपनी जिम्मेदारी समझे तो न तो सड़कों पर आवारा गौवंशों की समस्या होगी और न ही किसानों को अपनी फसलों की रखवाली के लिए रातें जागकर गुजारनी पड़ेंगी। जरूरत है स्थायी समाधान की—गौशालाओं का संचालन ईमानदारी से हो, जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय हो और आम जनता की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए
