गुस्ताखी माफ हरियाणा – पवन कुमार बंसल
“बुरा न मानो, होली है”
वरिष्ठ पत्रकार स्वतंत्र सक्सेना के सौजन्य से
जब पत्रकारिता में मेरे शुरुआती दिन थे, तब मेरी शुरुआत बरेली से प्रकाशित ‘विश्वमानव’ दैनिक से हुई थी। पत्रकारिता के क्षेत्र में मेरी पहली होली थी। उत्साह और शरारत के मिश्रण में मैंने “बुरा न मानो, होली है” शीर्षक से एक मज़ाकिया लेख लिख डाला।
उस लेख में मैंने यह लिख दिया कि बरेली के श्मशान घाट पर एक फिल्म की शूटिंग के सिलसिले में धर्मेंद्र और हेमा मालिनी बरेली आए हुए हैं। साथ ही यह भी जोड़ दिया कि बरेली का श्मशान घाट अत्यंत खूबसूरत बनाया गया है और उसके उद्घाटन के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद भी बरेली पधारे थे।
यौवन के अति उत्साह में मैंने इस मज़ाकिया खबर को अपने संबंधों का लाभ उठाकर यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ इंडिया (यूएनआई) के दिल्ली मुख्यालय से भी जारी करवा दिया।
नतीजा यह हुआ कि जब तक लोगों को समझ आता कि यह होली का मज़ाक है, तब तक बरेली के श्मशान घाट पर भारी भीड़ उमड़ पड़ी। हालात ऐसे बन गए कि उस भीड़ को नियंत्रित करने के लिए शहर की पूरी पुलिस फोर्स को पसीना बहाना पड़ा।
वह होली मेरे लिए पत्रकारिता का एक बड़ा सबक बन गई—समाचार की शक्ति और उसकी जिम्मेदारी, दोनों का अहसास उसी दिन हुआ।
गुस्ताखी माफ! आखिर होली थी।
