रामपुर: माता-पिता को खो चुके बेसहारा बच्चों के भरण-पोषण और शिक्षा के लिए महिला कल्याण विभाग द्वारा संचालित मुख्यमंत्री बाल सेवा योजना एक बड़ा सहारा बनकर सामने आई है। योजना को और अधिक पारदर्शी तथा सुलभ बनाने के लिए 19 दिसंबर 2025 से आवेदन प्रक्रिया को 100 प्रतिशत ऑनलाइन कर दिया गया है। अब पात्र आवेदक घर बैठे मोबाइल या लैपटॉप के माध्यम से आवेदन कर सकते हैं। जांच और जिला अनुमोदन समिति की स्वीकृति के बाद सीधे बच्चे के बैंक खाते में हर महीने 2500 रुपये की आर्थिक सहायता पहुंचने लगती है।
23 वर्ष की आयु तक दो चरणों में मिलता है लाभ
जिला प्रोबेशन अधिकारी ईरा आर्या ने बताया कि इस योजना का लाभ 0 से 23 वर्ष तक के बच्चों को दो चरणों में दिया जाता है। पहले चरण में 0 से 18 वर्ष तक के बच्चों को इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई के लिए सहायता दी जाती है। वहीं 18 वर्ष की आयु पूरी होने के बाद यदि बच्चा डिग्री कॉलेज या स्नातक की पढ़ाई कर रहा है तो उसे 23 वर्ष की आयु तक योजना के दूसरे चरण का लाभ दिया जाता है। योजना का मुख्य उद्देश्य बच्चों को शिक्षा से जोड़े रखना है, इसलिए स्कूल का प्रमाणपत्र लगाना अनिवार्य है।
रामपुर में 226 बच्चों के आवेदन स्वीकृत
जिले में योजना की स्थिति पर नजर डालें तो अब तक कुल 226 बच्चों के आवेदन स्वीकृत किए जा चुके हैं। इनमें बाल सेवा योजना (कोविड) के तहत 123 बच्चों को स्वीकृति मिली थी, जिनमें से 54 बच्चे वर्तमान में लाभ ले रहे हैं और उन्हें 4000 रुपये प्रतिमाह मिल रहे हैं।
वहीं बाल सेवा योजना (सामान्य) के तहत 103 बच्चों को स्वीकृति दी गई थी, जिनमें से 67 बच्चे वर्तमान में लाभान्वित हो रहे हैं और उन्हें 2500 रुपये प्रतिमाह की सहायता दी जा रही है। इसके अलावा 49 बच्चों को केंद्र सरकार की स्पॉन्सरशिप योजना में स्थानांतरित किया गया है, जहां उन्हें 4000 रुपये प्रति माह मिलते हैं।
कोविड और सामान्य योजना में अंतर
अधिकारियों के अनुसार कोविड के कारण अनाथ हुए बच्चों और सामान्य कारणों से अनाथ हुए बच्चों के लिए योजना में कुछ अंतर है। बाल सेवा योजना (कोविड) के तहत कक्षा 9 या उससे ऊपर पढ़ने वाले बच्चों को लैपटॉप दिया जाता है और बालिकाओं की शादी के लिए 1,01,000 रुपये का अनुदान भी दिया जाता है। जबकि बाल सेवा योजना (सामान्य) में यह दोनों प्रावधान शामिल नहीं हैं।
आवेदन प्रक्रिया और जरूरी दस्तावेज
महिला कल्याण विभाग की वेबसाइट mbsyup.in पर जाकर ऑनलाइन आवेदन किया जा सकता है। आवेदन के बाद फॉर्म स्वतः संबंधित ब्लॉक या तहसील में जांच के लिए भेज दिया जाता है। आवेदन के लिए माता-पिता का मृत्यु प्रमाण पत्र, बच्चे और अभिभावक का आधार कार्ड तथा स्कूल का प्रमाणपत्र आवश्यक है। यदि माता-पिता दोनों की मृत्यु हो चुकी है तो आय प्रमाण पत्र की जरूरत नहीं होती, जबकि एक अभिभावक के जीवित होने पर आय प्रमाण पत्र लगाना अनिवार्य है। सहायता राशि सीधे बच्चे के व्यक्तिगत बैंक खाते में भेजी जाती है।
हर छह महीने में होती है निगरानी
जिला बाल संरक्षण इकाई द्वारा हर छह महीने में इन बच्चों का फॉलोअप किया जाता है। इसमें यह देखा जाता है कि बच्चा नियमित रूप से स्कूल जा रहा है या नहीं और सहायता राशि का उपयोग बच्चे के हित में हो रहा है या नहीं। ग्राम स्तर पर आशा, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और पंचायत सचिव को भी ऐसे बच्चों की पहचान करने के निर्देश दिए गए हैं।
सफलता की कहानी
योजना की सफलता का उदाहरण देते हुए अधिकारियों ने बताया कि जिले में एक परिवार में माता-पिता दोनों के निधन के बाद तीन बच्चे अनाथ हो गए थे। उनकी बुआ ने बच्चों की जिम्मेदारी संभाली, लेकिन आर्थिक स्थिति कमजोर थी। सूचना मिलने पर विभाग ने उन्हें योजना से जोड़ा। आज उसी आर्थिक सहायता से तीनों बच्चों ने अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी कर ली है और उनका भविष्य सुरक्षित हो गया है।
