नालगोंडा, तेलंगाना – तेलंगाना के नालगोंडा जिले के पनागल गांव में स्थित छाया सोमेश्वर मंदिर केवल 1000 साल पुरानी वास्तुकला का अद्भुत नमूना नहीं है, बल्कि यह उन्नत वैज्ञानिक और ज्योतिषीय ज्ञान का जीता-जागता प्रमाण भी है। यह मंदिर 11वीं शताब्दी में इक्ष्वाकु वंश के कुंदुरु चोडा शासकों द्वारा बनवाया गया था।
विशेषताएँ और वैज्ञानिक चमत्कार
शिवलिंग पर रहस्यमयी छाया: मंदिर का नाम छाया सोमेश्वर इसलिए पड़ा क्योंकि शिवलिंग के पीछे दिन भर लगातार एक छाया पड़ती रहती है, जो सूर्य की स्थिति के बावजूद अपरिवर्तित रहती है। यह छाया किसी एक स्तंभ की सीधी छाया नहीं है, बल्कि आसपास के स्तंभों से परावर्तित प्रकाश के कारण बनती है।
त्रिकूट मंदिर संरचना: मंदिर परिसर में त्रिकूट (तीन देव शक्तियाँ) – शिव, विष्णु और सूर्य को समर्पित तीन गर्भगृह हैं। मंदिर की दिशा और स्तंभों की व्यवस्था इस तरह की गई है कि सूर्य की रोशनी दिनभर इस रहस्यमयी छाया को बनाए रखती है।
वास्तुकला और प्राचीन ज्ञान: मंदिर में केंद्रीय मंडप समदूरस्थ रूप से संरेखित है, जो समरूपता और वैज्ञानिक सूझबूझ को दर्शाता है। गर्भगृह के ऊपर स्थित विमान शिखर चार मुख्य स्तंभों वाले फामसना शैली में बने हैं।
इतिहास और धार्मिक महत्त्व
छाया सोमेश्वर महादेव मंदिर लगभग 800 वर्ष पुराना माना जाता है। यह हैदराबाद से लगभग 100 किमी दूर पनागल गांव में स्थित है। कार्तिक पूर्णिमा और महाशिवरात्रि के अवसर पर श्रद्धालु दूर-दूर से दर्शन के लिए आते हैं। मंदिर की स्थापत्य कला और रहस्यमयी छाया आज भी आगंतुकों और शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण का केंद्र है।
यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि प्राचीन भारतीय वास्तुकला और वैज्ञानिक सोच का अद्भुत संगम भी प्रस्तुत करता है।
डिस्क्लेमर- यहां दी गई जानकारियां सामाजिक और धार्मिक आस्थाओं पर आधारित हैं। khabrejunction.com इनकी पुष्टि नहीं करता।
