“चरित्र कभी मरते नहीं, यह बात अलग है कि समयानुसार उनकी छवि धूमिल होती है “

लेखक: डॉ. अनिला सिंह आर्य 

भारतीय इतिहास में हम अनेक विदूषियों और वीरांगनाओं के प्रेरणादायक व्यक्तित्व का उल्लेख पढ़ते आए हैं। लेकिन पढ़ा गया केवल वही, जो पाठ्यक्रम का हिस्सा बना। जिनके जीवन को नगण्य समझ लिया गया, उन्हें जानने की रुचि केवल उन्हीं को होती है जो इतिहास को सीमाओं से परे देखने की दृष्टि रखते हैं।

इतिहास सदैव सत्ता के प्रभाव से अछूता नहीं रह सका है। यही कारण है कि समय-समय पर कुछ महान चरित्र हमारी स्मृति से ओझल हो जाते हैं, फिर चाहे उन्होंने समाज और राष्ट्र के लिए कितना ही बड़ा योगदान क्यों न दिया हो।

इन दिनों वीरांगना अहिल्याबाई होलकर पर अनेक कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं, जिससे समूचा राष्ट्र उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन कर रहा है। तीन सौ वर्ष पूर्व जन्मी अहिल्याबाई ने मराठा राज्य पर लगभग अट्ठाईस वर्षों तक शासन किया—वह भी तब जब शासन व्यवस्था राजशाही पर आधारित थी। आज जहाँ एक कार्यकाल पाँच वर्ष का होता है, वहाँ अट्ठाईस वर्षों तक सफलतापूर्वक राज्य संचालन करना अपने आप में एक अद्वितीय उपलब्धि है।

यह भी नकारा नहीं जा सकता कि भारत में अनेक वीर और विदुषी महिलाएँ रही हैं, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में अपने अद्वितीय व्यक्तित्व और नेतृत्व क्षमता से इतिहास रचा है।

लेकिन आज कैसा युग आ गया है जहाँ वही नारी, जो कभी शक्ति की प्रतीक थी, अबला कही जाने लगी?

हम पुस्तकों और इंटरनेट के माध्यम से ऐतिहासिक जीवन गाथाएँ तो पढ़ सकते हैं, लेकिन वर्तमान की उन महिलाओं को कैसे नज़रअंदाज़ किया जा सकता है जो जीवन की कठोरताओं से जूझते हुए भी आत्मबल के सहारे आगे बढ़ रही हैं?

ऐसी अनेक महिलाएँ हैं जिन्होंने जीवन के कष्टसागर को पसीने की नौका से पार किया है।

अहिल्याबाई का जीवन एक विशिष्ट चरित्र के रूप में आज भी प्रासंगिक है। उनकी तीन शताब्दियाँ पूर्ण होने के उपलक्ष्य में आज जो आयोजन हो रहे हैं, वे केवल श्रद्धांजलि नहीं बल्कि आत्ममंथन का भी अवसर हैं। एक वीरांगना होने के साथ-साथ वे एक समाज सुधारिका भी थीं। उस काल में जब स्त्रियाँ सामाजिक बेड़ियों से जकड़ी थीं, अहिल्याबाई ने सामाजिक कार्यों को आगे बढ़ाया और स्त्री सशक्तिकरण का सशक्त उदाहरण प्रस्तुत किया।

आज राजनीति में जहाँ व्यक्तिगत स्वार्थों की अधिकता है, वहाँ वीरता और कर्तव्यनिष्ठा का स्थान कम होता जा रहा है। भले ही संविधान ने महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान किया हो, लेकिन वह आत्मबल, वह नेतृत्व क्षमता और वह बौद्धिक परिपक्वता जो अहिल्याबाई जैसी वीरांगनाओं में थी—उसे आत्मसात करना आज की नारी के लिए अत्यंत आवश्यक है।

अहिल्याबाई का जीवन आज भी एक जीवंत उदाहरण है। हम उन्हें नमन करते हुए वर्तमान मातृशक्ति से आशा करते हैं कि वे उनके जीवन से प्रेरणा लेकर स्वयं को समाज के सामने आदर्श चरित्र के रूप में प्रस्तुत करें।

श्रद्धा सुमन सहित, शत् शत् नमन।

लेखक: डॉ. अनिला सिंह आर्य
नीति और शोध प्रमुख, जिला गाजियाबाद

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