“भाई कोई भी ले लो… केम्पा कोला ही तो है, कौन-सी सतलुज–यमुना जोड़ नहर है जो नहीं आएगी”
श्री प्रभाष जोशी द्वारा विमोचित किताब “हरियाणा के लालों के सबरंगे किस्से” से साभार।
गुस्ताख़ी माफ़ हरियाणा पवन कुमार बंसल
हरियाणा और पंजाब में सतलुज–यमुना जोड़ (SYL) नहर को लेकर राजनीति आज भी उसी जोश के साथ जारी है, जैसे दशकों पहले हुआ करती थी। यह मुद्दा जितना पुराना है, उससे कहीं ज्यादा पुराने हैं वे किस्से, जो हरियाणा की राजनीतिक गलियारों में मुस्कुराहट के साथ दोहराए जाते हैं। ऐसा ही एक वाकया जींद में खेल प्रतियोगिता के दौरान घटित हुआ, जिसने उस दिन उपस्थित सभी लोगों को ठहाका लगाने पर मजबूर कर दिया।
जींद का वह यादगार दिन
उस समय जींद, अम्बाला पुलिस रेंज का हिस्सा था। रानी तालाब के पास बने स्टेडियम में रेंज स्तरीय खेलकूद प्रतियोगिता आयोजित थी।
अगली पंक्ति में बैठे थे—
डीआईजी स्वदेश कुमार सेठी,
तत्कालीन सिंचाई मंत्री शमशेर सिंह सुरजेवाला।
पीछे की कतार में मौजूद थे—
जींद के विधायक बृजमोहन सिंघल,
उचाना के विधायक सूबे सिंह पुनिया।
मैं, उस समय इंडियन एक्सप्रेस का जींद रिपोर्टर, दोनों के बीच बैठा था।
‘पहले आप’ की राजनीति और कैम्पा कोला
इसी दौरान एक सिपाही कैम्पा कोला की दो बोतलें लेकर पहुंचा।
सिंघल जी बोले—
“पुनिया साहिब को दे दो।”
पुनिया साहिब ने मुस्कुराते हुए कहा—
“पहले सिंघला साहिब और पत्रकार को दे दो।”
कुछ देर तक लखनवी अंदाज़ में ‘पहले आप – पहले आप’ की शालीन जुगलबंदी चलती रही। माहौल हल्का-फुल्का और दिलचस्प हो चुका था।
इसी मौके पर मैंने चुटकी लेते हुए कहा—
**“भाई कोई भी ले लो… केम्पा कोला ही तो है, फिर आ जाएगी।
कौन-सी सतलुज–यमुना नहर है जो नहीं आएगी!”**
मेरे इतना कहते ही अगली पंक्ति में बैठे सुरजेवाला जी मेरी तरफ देखने लगे, जैसे उस मज़ाक में छुपे राज को पढ़ने की कोशिश कर रहे हों।
चारों ओर हल्की हंसी फैल गई—पर बात अपने आप में एक गहरी सच्चाई कह गई।
SYL — न तब आई, न अब तक आई… पर राजनीति जारी
उस घटना को सालों बीत गए,
अधिकारियों के पद बदल गए,
सरकारें बदल गईं,
राजनीतिक चेहरे बदल गए…
पर सतलुज–यमुना जोड़ नहर आज भी अधूरी है,
और इसके नाम पर राजनीति आज भी पूरी गर्मी से जारी है।
समय बदल सकता है, कैम्पा कोला फिर आ सकता है…
पर SYL का आना—अब भी राजनीति की ही बोतल में बंद है।
