“बिहार चुनाव : बीमारू राज्यों से बाहर निकालने की चुनौती

  • गुस्ताख़ी माफ़ी हरियाणा- पवन कुमार बंसल

हमारे प्रबुद्ध पाठक सतीश मेहरा द्वारा।..

“बिहार चुनाव : बीमारू राज्यों से बाहर निकालने की चुनौतीi

बिहार में नवंबर माह में होने वाले विधानसभा चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन के लिए हैं या बिहार को बीमारू राज्यों की सूची से बाहर निकालने के लिए महत्वपूर्ण होंगे। इस चुनाव को राज्य की दिशा और दशा तय करने वाला चुनाव माना जा रहा है । 21वीं शदी की शुरुआत से ही बिहार में नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बनते आ रहे हैं। पिछले 20-25 साल में देश- दुनिया में बहुत तीव्र गति से टेक्नोलॉजी का विकास हुआ है। 20वीं शदी के अंत में पीसी से लेकर मोबाइल, इंटरनेट और अब ए आई टेक्नोलॉजी के प्रयोग ने विश्व में विकास की गति को और तेज कर दिया है। यह कहा जा सकता है कि विश्व में 20वीं सदी तक 20-25 साल में जो परिवर्तन आता था वहीं अब हर दो चार साल के बाद हर क्षेत्र में परिवर्तन देखने को मिल रहा है। अब सवाल यह पैदा होता है कि क्या पिछले 20 वर्षों में बिहार ने नई टेक्नोलॉजी के तहत प्रगति की है। यदि बिहार में नई टेक्नोलॉजी के अनुसार प्रगति हुई है तो निश्चित रूप से इसका श्रेय नीतीश कुमार को जाएगा और यदि नई टेक्नोलॉजी को देखते हुए प्रगति का पैमाना कम रहा है तो उसका नुकसान भी नीतीश कुमार और एनडीए भुगतना पड़ेगा। आज सत्ता के सामने बहुत सारे सवाल मूंह बाए खड़े हैं। प्रदेश में बढती बेरोजगारी, बढ़ती पलायन की दर, शिक्षा, स्वास्थ्य और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों से प्रदेश की जनता को जूझना पड़ रहा है।
सवाल यह है कि क्या बिहार के मतदाता इस बार वास्तविक मुद्दों — शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी, पलायन और सामाजिक न्याय — पर मतदान करेंगे, या चुनाव फिर से “फ्री रेवड़ियों” और “धार्मिक ध्रुवीकरण” की भेंट चढ़ जाएगा?
भारत निर्वाचन आयोग के अनुसार, बिहार विधानसभा चुनाव में इस बार नए मतदाताओं की संख्या भी उल्लेखनीय है — 10 लाख से अधिक युवा पहली बार वोट डालेंगे। चुनाव में भाग ले रहे सभी राजनीतिक दल युवाओं की आवश्यकताओं को एड्रेस कर रहे हैं । परंतु इसके समानांतर, सभी राजनीतिक दल “फ्री रेवड़ियों” यानी मुफ्त लाभों की घोषणा में भी पीछे नहीं हैं। बिहार में नीतीश सरकार ने 75 लाख महिलाओं के बैंक खातों में सीधे Rs. 10,000 की सहायता राशि ट्रांसफर कर दी है। 10-10 हजार रुपये की राशि ट्रांसफर होने से महिलाओं को बड़ी सौगात मिली है। मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत पीएम मोदी ने सीधे बैंक खातों में पहली किस्त भेजी। महिलाओं को आर्थिक सहायता, बिजली बिल माफी, फ्री स्कूटी और गैस सिलेंडर जैसे प्रमुख वायदे किए हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर अपने चुनावी अभियान का आरंभ जननायक कर्पूरी ठाकुर के गांव से किया। अपनी चुनावी सभा में प्रधानमंत्री ने कहा कि नीतीश कुमार और हम जैसे पिछड़े और गरीब परिवारों से निकले लोग एक मंच पर हैं। प्रधानमंत्री अपनी जनसभा में बिहार की जनता को लालू प्रसाद यादव के शासन काल को जंगल राज के रूप में याद करवा रहे हैं और प्रदेश में विकास की रफ्तार और तीव्र करने का वादा कर रहे हैं।
दूसरी ओर तेजस्वी कह रहे हैं कि बिहार बदलाव के लिए तैयार है, तेजस्वी ने कहा कि जनता ने एनडीए को 20 साल दिए, हम बस 20 महीने का वक्त मांगते हैं, बिहार को नंबर वन बनाने के लिए। वे जीविका दीदी को ₹30000 प्रति माह और हर घर से सरकारी नौकरी देने का वादा कर रहे हैं। उन्होंने ऐलान किया कि महागठबंधन की सरकार बनते ही पंचायत और ग्राम प्रतिनिधियों का मानदेय दोगुना किया जाएगा। इतना ही नहीं, उन्हें पेंशन सुविधा और 50 लाख रुपये का बीमा कवर भी मिलेगा। यह कदम बिहार के लाखों जनप्रतिनिधियों के लिए बड़ा राहत संदेश माना जा रहा है। इसके साथ ही, जन वितरण प्रणाली (PDS) के वितरकों के मानदेय और मार्जिन मनी में भी बढ़ोतरी की घोषणा की है।
इस चुनाव में एक और प्रमुख पहलू है — धार्मिक ध्रुवीकरण। कुछ दल और नेता मतदाताओं का ध्यान असली मुद्दों से हटाकर धर्म,आस्था और जात-पात पर केंद्रित करने की कोशिश में हैं। जहां एनडीए पर धर्म और आस्था का प्रचार कर वोट हथियाने का आरोप लग रहा है वहीं राष्ट्रीय जनता दल ,महागठबंधन पर जात-पात की राजनीति करने का आरोप लग रहा है। छठ पूजा जैसे पर्वों में राजनीतिक उपस्थिति पर सवाल उठ रहे हैं — क्या प्रधानमंत्री या शीर्ष नेताओं का धार्मिक मंचों पर भाग लेना आचार संहिता का उल्लंघन है? यह विवाद अभी खुला है, परंतु इतना तय है कि धार्मिक प्रतीकों का चुनावी उपयोग बढ़ा है। क्या जनता मुद्दों को प्राथमिकता देगी या फिर धार्मिक भावनाएँ राजनीतिक परिणाम तय करेंगी? बिहार आज भी कई विकास-सूचकों में देश के सबसे पिछड़े राज्यों में गिना जाता है।सीमित औद्योगिक विकास ,शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था जर्जर,पलायन दर ऊँची,बुनियादी ढांचा कमजोर। इसी कारण से राज्य को “बीमारू” टैग से मुक्त करने के लिए ठोस नेतृत्व व विकासकारी योजनाओं की आवश्यकता है। आज भी बड़ी संख्या में बिहार के युवा दिल्ली, मुंबई, हरियाणा, गुजरात और पंजाब की फैक्टरियों में काम करने को मजबूर हैं। कुछ नेता अब भी 20वीं सदी की परंपरागत राजनीति — जातीय समीकरण, पहचान और क्षेत्रीय वादों — के सहारे सत्ता पाना चाहते हैं। परंतु 21वीं सदी का बिहार बदल चुका है। अब मतदाता अधिक जागरूक, तकनीकी रूप से सक्षम और परिणामोन्मुख है।बिहार को ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो डेटा और तकनीक आधारित नीति बनाए, और विकास को जाति या धर्म से ऊपर रखे।
एनडीए (भाजपा-जेडीयू) और महागठबंधन (राजद-कांग्रेस-लेफ्ट) दोनों ही आंतरिक असंतोष और संभावित फूट से जूझ रहे हैं। इस बार प्रशांत किशोर (पीके) की जन सुराज पार्टी और ओवैसी की एआईएमआईएम भी मैदान में हैं, जो सीमांचल और शहरी क्षेत्रों में वोटों का समीकरण बदल सकती हैं।राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि इस बार चुनाव में “त्रिकोणीय मुकाबले” के कई पहलू देखने को मिल सकते हैं। छठ मैया की पूजा बिहार की अस्मिता का प्रतीक है। ऐसे में छठ कार्यक्रम समारोहों में किसी राजनीतिक नेता की उपस्थिति धार्मिक प्रयोग माना जाए या नहीं , यह चुनाव आयोग को परखना होगा कि क्या ऐसे आयोजन “राजनीतिक लाभ” के लिए प्रयोग किए जा सकते हैं या नहीं। बिहार का यह चुनाव केवल सत्ता पाने का नहीं, बल्कि राज्य की आत्मा के पुनर्निर्माण का चुनाव है। क्या बिहार “रेवड़ियों” से ऊपर उठकर विकास को प्राथमिकता देगा?‌ क्या धार्मिक-सांप्रदायिक विमर्शों से ध्यान हटाकर रोजगार, शिक्षा और उद्योग पर फोकस होगा?
बिहार विधानसभा चुनाव में 20वीं सदी की जातिगत और धर्मांधता की राजनीति से बाहर निकलकर 21वीं सदी की विकास-राजनीति की शुरुआत होगी‌ जो बिहार को बीमारू राज्यों की स्थिति से बाहर निकाल पाने में सक्षम होगी।

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