ढाका। पड़ोसी देश बांग्लादेश एक बार फिर चुनावी हिंसा की आग में झुलस रहा है। गुरुवार, 12 फरवरी को देश में मतदान हो रहा है, लेकिन उससे पहले ही विभिन्न जिलों में हुई राजनीतिक झड़पों ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब तक दर्जनों लोग घायल हो चुके हैं और कई कार्यकर्ताओं की जान जा चुकी है।
अंतरिम सरकार के प्रमुख और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के सामने शांतिपूर्ण चुनाव कराने की बड़ी चुनौती है, लेकिन हालात नियंत्रण से बाहर होते दिख रहे हैं।
BNP बनाम जमात सीधा मुकाबला
इस बार मुख्य मुकाबला बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और जमात-ए-इस्लामी के बीच है। शेख हसीना की अवामी लीग फिलहाल चुनावी दौड़ से बाहर है। हालिया हिंसा की शुरुआत मतदाताओं को पैसे बांटने के आरोपों के बाद हुई, जब दोनों दलों के समर्थक आमने-सामने आ गए।
बांगुरा जिले में हिंसा इतनी बढ़ गई कि एक राजनीतिक नेता की आंख तक निकाल ली गई। अब तक 40 से अधिक लोग घायल बताए जा रहे हैं। छात्रों के नेतृत्व वाली नेशनल सिटिजन पार्टी तीसरी ताकत के रूप में उभर रही है, जिससे मुकाबला और जटिल हो गया है।
हिंसा का पुराना इतिहास
बांग्लादेश का राजनीतिक इतिहास शुरू से ही उथल-पुथल भरा रहा है। 1971 में आजादी के बाद 1975 में राष्ट्रपिता शेख मुजीबुर रहमान और उनके परिवार की हत्या कर दी गई। इसके बाद देश लंबे समय तक सैन्य शासन के अधीन रहा।
1979 में जिया-उर-रहमान ने BNP की स्थापना की, लेकिन 1981 में उनकी भी हत्या कर दी गई। बाद में जनरल हुसैन मोहम्मद इरशाद ने सत्ता संभाली और मार्शल लॉ लागू किया।
‘बैटल ऑफ बेगम्स’ का दौर
1991 में लोकतंत्र की वापसी के साथ दो शक्तिशाली नेताओं का उदय हुआ—अवामी लीग की शेख हसीना और BNP की खालिदा जिया। दोनों ने मिलकर सैन्य शासन को हटाया, लेकिन बाद में एक-दूसरे की कट्टर प्रतिद्वंद्वी बन गईं।
1991 के चुनाव में 49 लोगों की मौत हुई। 2008 का चुनाव अपेक्षाकृत शांत रहा, लेकिन 2014 सबसे हिंसक साबित हुआ, जब 142 लोगों की जान गई। 2018 में भी चुनाव पूर्व हिंसा में दर्जनों लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हुए।
अगस्त 2024 का बड़ा राजनीतिक बदलाव
अगस्त 2024 में छात्रों के बड़े आंदोलन के बाद शेख हसीना को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देकर देश छोड़ना पड़ा। उनकी पार्टी अवामी लीग पर प्रतिबंध लगा दिया गया। वहीं खालिदा जिया का निधन हो चुका है और उनके बेटे तारिक रहमान लंदन से लौटकर BNP का नेतृत्व कर रहे हैं। यह पहला चुनाव है जो दोनों प्रमुख महिला नेताओं की अनुपस्थिति में हो रहा है।
हालिया हिंसा के आंकड़े
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, दिसंबर से अब तक एक दर्जन से अधिक राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है, जिनमें 13 BNP कार्यकर्ता शामिल हैं। ढाका सहित कई इलाकों में दिनदहाड़े गोलीबारी और हमलों की घटनाएं सामने आई हैं।
आगे क्या?
बांग्लादेश आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। एक ओर अंतरिम सरकार सुधार और स्थिरता का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई सड़कों पर खून बहा रही है।
यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि यह तय करेगा कि क्या बांग्लादेश हिंसा और अस्थिरता के इस चक्र से बाहर निकल पाएगा या फिर इतिहास खुद को दोहराएगा।
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