ZEE रियल हीरोज इवेंट में ISRO की वैज्ञानिक दक्षियानी का बड़ा बयान—‘इसरो में जेंडर नहीं, काम बोलता है’
नई दिल्ली। ZEE रियल हीरोज अवॉर्ड 2026 के मंच पर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की दो दिग्गज महिला वैज्ञानिकों मंगला मणि और दक्षियानी का भव्य स्वागत किया गया। इस अवसर पर दोनों वैज्ञानिकों ने न केवल अपने प्रेरणादायी अनुभव साझा किए, बल्कि भारत की वैज्ञानिक शक्ति और वैश्विक उपलब्धियों पर भी प्रकाश डाला।
इसरो में चयन को लेकर वैज्ञानिक दक्षियानी का बड़ा दावा
साइंटिस्ट दक्षियानी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ISRO में महिला और पुरुष के बीच किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं होता। उन्होंने कहा कि जब सैटेलाइट, सॉफ्टवेयर या हार्डवेयर पर काम होता है, तो यह नहीं देखा जाता कि उसे किसने बनाया है। यहां केवल तकनीकी क्षमता, दक्षता और परिणाम को महत्व दिया जाता है।
उन्होंने बताया कि इसरो का प्रबंधन अत्यंत पेशेवर है और महिलाओं को पुरुषों के समान सम्मान और अवसर मिलते हैं।
अंतरिक्ष से अंटार्कटिका तक भारत की उड़ान
वैश्विक सोच को चुनौती देते हुए दक्षियानी ने कहा कि विज्ञान और तकनीक को लंबे समय तक केवल विकसित देशों की बपौती माना जाता रहा, लेकिन मंगलयान की ऐतिहासिक सफलता और चंद्रयान की सटीक लैंडिंग ने पूरी दुनिया को यह दिखा दिया कि भारत किसी से कम नहीं है।
इन मिशनों ने भारत को उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में खड़ा कर दिया है, जिनके पास उन्नत अंतरिक्ष तकनीक है।
‘काम बोलता है, जेंडर नहीं’
महिलाओं की भूमिका पर बोलते हुए दक्षियानी ने कहा कि इसरो में जेंडर नहीं, काम बोलता है। यहां किसी परियोजना का मूल्यांकन उसके तकनीकी मानकों पर किया जाता है, न कि उसे करने वाले व्यक्ति की पहचान पर।
-80 डिग्री तापमान में लहराया भारत का तिरंगा
कार्यक्रम में वैज्ञानिक मंगला मणि की कहानी ने सभी को भावुक कर दिया। 56 वर्षीय मंगला मणि ने -80 डिग्री सेल्सियस के अत्यंत कठिन तापमान में अंटार्कटिका मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम दिया।
उन्होंने बताया कि यह एक स्वैच्छिक चुनौती थी, जिसे उन्होंने देश के लिए स्वीकार किया। अंटार्कटिका जैसे दुर्गम क्षेत्र में शारीरिक और मानसिक फिटनेस बेहद जरूरी होती है, क्योंकि आपात स्थिति में संपर्क साधना भी अत्यंत कठिन हो जाता है।
आत्मनिर्भर भारत और डेटा की ताकत
मंगला मणि ने कहा कि अंटार्कटिका में भारत का अपना रिसर्च स्टेशन होना देश के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। यदि यह स्टेशन न होता, तो भारत को डेटा के लिए अन्य देशों पर निर्भर रहना पड़ता और कुछ ही मिनटों के डेटा के लिए 500 डॉलर तक चुकाने पड़ते।
आज भारत का स्टेशन 24 घंटे डेटा उपलब्ध करा रहा है, जिससे न केवल आर्थिक बचत हो रही है, बल्कि मछुआरों को समुद्री तटों की सटीक जानकारी भी मिल रही है।
ZEE रियल हीरोज इवेंट में दोनों वैज्ञानिकों की उपस्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारतीय विज्ञान आज आत्मनिर्भर, समावेशी और वैश्विक नेतृत्व की ओर अग्रसर है।
khabre junction
