गुस्ताखी माफ़ हरियाणा – पवन कुमार बंसल
लखनऊ में जब पहली बार म्युनिसिपैलिटी के चुनाव हुए, तो चौक से अपने ज़माने की मशहूर तवायफ़, महफ़िलों की रौनक और नज़ाकत की मिसाल — दिलरुबा जान — उम्मीदवार बनीं। उनके रुतबे और लोकप्रियता का ऐसा असर था कि कोई भी उनके मुक़ाबिल खड़ा होने को तैयार न हुआ।
उन्हीं दिनों चौक में एक नाम बड़े अदब से लिया जाता था — हकीम शम्शुद्दीन साहेब। दवाख़ाना भी था, शोहरत भी, और मरीज़ों की भीड़ भी। दोस्तों ने ज़ोर-ज़बरदस्ती उन्हें दिलरुबा जान के मुक़ाबिल मैदान-ए-इंतिख़ाब में उतार दिया।
दिलरुबा जान का प्रचार शबाब पर था। चौक में हर शाम महफ़िलें सजतीं, मशहूर नर्तकियाँ बुलायी जातीं, और हुजूम उमड़ पड़ता। उधर हकीम साहेब के साथ बस वही गिने-चुने दोस्त थे, जिन्होंने उन्हें इस आज़माइश में धकेला था।
हकीम साहेब खिन्न होकर बोले,“तुम लोगों ने तो मुझे पिटवा ही दिया, हार अब मुक़द्दर है।”
दोस्तों ने हिम्मत न हारी और एक नारा गढ़ा —“है हिदायत चौक के हर वोटर-ए-शौक़ीन को,
दिल दीजिए दिलरुबा को, वोट शम्शुद्दीन को!”
जवाब में दिलरुबा जान ने अपनी नज़ाकत से तराशा हुआ नारा दिया —“है हिदायत चौक के हर वोटर-ए-शौक़ीन को,
वोट दीजिए दिलरुबा को, नब्ज़ शम्शुद्दीन को!”
नतीजा वही हुआ जो लखनवी ज़ेहनियत से मेल खाता था। हकीम साहेब का नारा दिलों में उतर गया और वे चुनाव जीत गए।
लखनऊ की तहज़ीब देखिए कि दिलरुबा जान ख़ुद हकीम साहेब के घर तशरीफ़ लाईं, मुबारकबाद पेश की और मुस्कुराकर बोलीं —
“मैं इंतिख़ाब हार गई और आप जीते, मुझे इसका कोई मलाल नहीं।
मगर आपकी जीत ने एक हक़ीक़त साबित कर दी है —‘लखनऊ में मर्द कम हैं, मरीज़ ज़्यादा।’”
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