77वें गणतंत्र दिवस के बाद संवैधानिक अधिकार और नागरिक जिम्मेदारी पर पुनर्विचार का समय

— डॉ. अतुल मलिकराम (राजनीतिक रणनीतिकार)

हाल ही में देश ने अपना 77वां गणतंत्र दिवस पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया। परेड, सांस्कृतिक झांकियां, राष्ट्रपति का संबोधन और राष्ट्रगान की गूंज एक बार फिर राष्ट्रीय चेतना का हिस्सा बनीं। हर वर्ष की तरह इस बार भी 26 जनवरी ने देशवासियों को गर्व की अनुभूति कराई। लेकिन गणतंत्र दिवस केवल उत्सव का अवसर नहीं होता, बल्कि यह वह दिन होता है जब राष्ट्र स्वयं से अपने संविधान, लोकतंत्र और नागरिक आचरण को लेकर संवाद करता है।

26 जनवरी 1950 को लागू हुआ भारतीय संविधान केवल सत्ता हस्तांतरण का दस्तावेज़ नहीं था, बल्कि यह स्वतंत्र भारत का नैतिक घोषणापत्र था। इसमें यह स्पष्ट किया गया कि आज़ादी का अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था की स्थापना है जिसमें नागरिक और राज्य के बीच अधिकारों और कर्तव्यों का संतुलित संबंध हो।

भारतीय संविधान को प्रायः “अधिकारों का दस्तावेज़” कहा जाता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता का अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता तथा जीवन और गरिमा का अधिकार जैसे मौलिक अधिकारों ने नागरिकों को वह आत्मविश्वास दिया, जिसकी औपनिवेशिक दौर में कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। पहली बार राज्य नागरिक की गरिमा का संरक्षक बना, न कि उसका स्वामी। लेकिन संविधान की आत्मा केवल अधिकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि अधिकारों और उत्तरदायित्वों के बीच स्थापित संतुलन में निहित है।

संविधान निर्माताओं को यह भली-भांति ज्ञात था कि यदि स्वतंत्रता को उत्तरदायित्व से अलग कर दिया गया, तो लोकतंत्र लंबे समय तक टिक नहीं पाएगा। इसी सोच के तहत मौलिक कर्तव्यों की अवधारणा को संविधान में स्थान दिया गया। यह केवल कानूनी प्रावधान नहीं, बल्कि एक नैतिक संदेश है कि लोकतंत्र केवल मांगों से नहीं, बल्कि सहभागिता से चलता है। नागरिक जितने अपने अधिकारों के प्रति सजग हों, उतना ही कर्तव्यों के प्रति भी सजग होना आवश्यक है।

लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनावी परिणामों में नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के सार्वजनिक जीवन में होती है। जब कानून हमारे पक्ष में न हो, तब भी उसका सम्मान करना, जब हमारे विचारों से अलग मत सामने आएं तो संवाद का रास्ता अपनाना और जब हमारे पास सत्ता या प्रभाव हो, तब संयम बरतना—यही लोकतंत्र की कठिन लेकिन आवश्यक कसौटियां हैं।

संविधान ने हमें अधिकार इसलिए नहीं दिए कि हम दूसरों को चुप करा सकें, बल्कि इसलिए दिए कि हम बिना भय के अपनी बात रख सकें। उसने हमें स्वतंत्रता इसलिए नहीं दी कि हम नियमहीन हो जाएं, बल्कि इसलिए दी कि हम विवेकपूर्ण और जिम्मेदार निर्णय ले सकें। स्वतंत्रता का अर्थ अनुशासन का अंत नहीं, बल्कि आत्म-अनुशासन की शुरुआत है।

वर्तमान समय में अधिकारों की भाषा अत्यंत मुखर हो गई है, जो एक हद तक आवश्यक भी है। लेकिन जब अधिकार जिम्मेदारी से कट जाते हैं, तो वे संवाद की जगह टकराव का कारण बन जाते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता यदि संवेदनशीलता से रहित हो जाए, तो समाज को जोड़ने के बजाय विभाजित करती है। विरोध का अधिकार यदि व्यवस्था को नष्ट करने का औज़ार बन जाए, तो वह लोकतंत्र को मजबूत नहीं, बल्कि कमजोर करता है।

कर्तव्यों की अवधारणा अक्सर अधिकारों के शोर में दब जाती है, जबकि वास्तव में वही लोकतंत्र की नींव है। मतदान करना, कानून का पालन करना, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना, सामाजिक सद्भाव बनाए रखना और वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करना—ये केवल संवैधानिक शब्द नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जीवन की अनिवार्य शर्तें हैं। जब नागरिक अपने कर्तव्यों को गंभीरता से निभाते हैं, तब राज्य को कठोर होने की आवश्यकता नहीं पड़ती। और जब नागरिक अपने दायित्वों से विमुख हो जाते हैं, तब सबसे अच्छे कानून भी प्रभावहीन हो जाते हैं।

77वें गणतंत्र दिवस के बाद यह समय है कि हम अपने संवैधानिक अधिकारों के साथ-साथ अपनी नागरिक जिम्मेदारियों पर भी गंभीर पुनर्विचार करें, क्योंकि मजबूत लोकतंत्र का आधार केवल अधिकार नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक होते हैं।

 

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