नई दिल्ली, 19 मई: केंद्रीय मंत्री किरन रिजिजू के इस दावे पर कि सरकार ने विदेश भेजे जा रहे सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडलों के लिए कांग्रेस से कोई नाम नहीं मांगे, कांग्रेस ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है और इसे “साफ झूठ” करार दिया है। कांग्रेस ने इसे “सस्ती राजनीति” बताते हुए कहा कि सरकार ने जानबूझकर विपक्ष से भेजे गए नामों को दरकिनार किया।
कांग्रेस महासचिव (संचार प्रभारी) जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा,
“जो प्रधानमंत्री अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कतर, दक्षिण कोरिया और चीन में जाकर कांग्रेस को गालियां देते हैं, अब वही विपक्ष से सहयोग मांग रहे हैं। क्या प्रधानमंत्री को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी को फोन करके बात नहीं करनी चाहिए थी?”
कांग्रेस ने भेजे थे 4 नाम
शनिवार को कांग्रेस ने बताया था कि सरकार की ओर से चार नेताओं के नाम भेजने का आग्रह किया गया था। पार्टी ने आनंद शर्मा, गौरव गोगोई, सैयद नासिर हुसैन और राजा वड़िंग के नाम सुझाए थे।
लेकिन इन चार में से केवल आनंद शर्मा को प्रतिनिधिमंडल में शामिल किया गया, जबकि शशि थरूर, मनीष तिवारी, अमर सिंह और सलमान खुर्शीद जैसे नेता—जो कांग्रेस की सूची में नहीं थे—सरकार ने अपने स्तर पर चुन लिए।
जब रिजिजू से उनके बयान पर सवाल पूछा गया कि सरकार ने नाम ही नहीं मांगे, तो इस पर जयराम रमेश ने तीखी प्रतिक्रिया दी:
“ये झूठ है—साफ झूठ। 16 मई की सुबह कांग्रेस अध्यक्ष और राहुल गांधी की रिजिजू से बात हुई थी, और उसी के अनुसार कांग्रेस ने चार नाम भेजे। लेकिन सरकार ने कभी यह शिष्टाचार नहीं दिखाया कि वे बताएँ कि किन नामों को चुना गया है।”
“सस्ती राजनीति कर रही है भाजपा”
रमेश ने कहा,
“प्रधानमंत्री की छवि को गहरी चोट पहुंची है और वे नरेटिव बदलने के लिए हताशा में हैं। हम मांग करते हैं कि प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में सर्वदलीय बैठक बुलाई जाए और 1994 की संसदीय प्रस्ताव को दोहराया जाए, जिससे देश को विश्वास में लिया जा सके।”
उन्होंने कहा कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से भारत को सामरिक रूप से भले लाभ मिला हो, लेकिन कूटनीतिक रूप से छवि को नुकसान हुआ है।
“आज भारत का संदेश क्या है? नफरत और साम्प्रदायिक तनाव पर आधारित राष्ट्रवाद। यही संदेश क्या दुनिया को देना चाहते हैं?”
“हमने एक देश, एक संदेश की बात की, भाजपा ने जहर फैलाया”
रमेश ने कहा कि कांग्रेस का हमेशा मानना रहा है कि एकता और समरसता जरूरी है, लेकिन भाजपा ने “एक देश, एक संदेश” को ध्रुवीकरण और ज़हर भरे राष्ट्रवाद में बदल दिया है।
उन्होंने कहा,
“2008 में डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार ने सभी दलों से बातचीत करके प्रतिनिधिमंडल तय किए थे। 1990 के दशक में जब वाजपेयी जी विपक्ष में थे और नरसिंह राव प्रधानमंत्री थे, तब भी दोनों में संवाद हुआ था। लेकिन मोदी सरकार सिर्फ सत्ता की राजनीति में लगी है।”
कौन-कौन जा रहे हैं प्रतिनिधिमंडलों में?
कुल सात प्रतिनिधिमंडल विदेशों में भारत की आतंकवाद विरोधी नीति को लेकर 32 देशों और यूरोपीय संघ मुख्यालय (ब्रसेल्स) जाएंगे। हर प्रतिनिधिमंडल में 7-8 नेता हैं और उनके साथ पूर्व राजनयिक भी हैं।
इनमें शामिल नेता:
- बैजयंत पांडा (भाजपा)
- रवि शंकर प्रसाद (भाजपा)
- संजय कुमार झा (जेडीयू)
- श्रीकांत शिंदे (शिवसेना)
- शशि थरूर (कांग्रेस)
- कनीमोझी (डीएमके)
- सुप्रिया सुले (एनसीपी-एसपी)
कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि विपक्ष को सिर्फ दिखावे के लिए जोड़ा गया, असल में प्रतिनिधिमंडलों का चयन पक्षपातपूर्ण और राजनीति से प्रेरित है। जयराम रमेश के अनुसार, मोदी सरकार की ‘विश्वगुरु’ छवि को धक्का लगा है और यह पूरा अभियान ‘डैमेज कंट्रोल’ बनकर रह गया है।
कांग्रेस ने साफ किया है कि वह आतंकवाद जैसे मुद्दों पर देश के साथ खड़ी है, लेकिन भाजपा विपक्ष को दरकिनार करके एकतरफा छवि पेश कर रही है, जो राष्ट्रीय हित के खिलाफ है।
