मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न देने की उठी मांग, डॉ. अतुल मलिकराम ने बताया ऐतिहासिक न्याय का सवाल

भारत के महान हॉकी खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न देने की मांग एक बार फिर जोर पकड़ रही है। राजनीतिक रणनीतिकार डॉ. अतुल मलिकराम ने कहा कि गुलामी के दौर में भी भारत को विश्व विजेता बनाने वाले इस महान खिलाड़ी को अब तक भारत रत्न न मिलना एक ऐतिहासिक विडंबना है।

उन्होंने 1936 के बर्लिन ओलंपिक 1936 का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय जर्मनी के तानाशाह एडॉल्फ हिटलर भी ध्यानचंद की प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें जर्मनी में उच्च पद और सम्मानजनक जीवन का प्रस्ताव दे चुके थे, लेकिन ध्यानचंद ने इसे ठुकराकर देशभक्ति और स्वाभिमान का परिचय दिया।

डॉ. मलिकराम ने कहा कि मेजर ध्यानचंद केवल एक खिलाड़ी नहीं थे, बल्कि उस दौर में भारत के आत्मसम्मान और गौरव के प्रतीक थे। उन्होंने तीन ओलंपिक स्वर्ण पदक जीतकर विश्व स्तर पर भारत का नाम रोशन किया, जबकि उस समय संसाधनों और सुविधाओं का अभाव था।

उन्होंने कहा कि आज भारत अमृत काल और विश्वगुरु बनने की बात कर रहा है, लेकिन किसी भी राष्ट्र की महानता इस बात से तय होती है कि वह अपने इतिहास के नायकों को कितना सम्मान देता है। ध्यानचंद के नाम पर स्टेडियम, डाक टिकट और राष्ट्रीय खेल दिवस जैसे सम्मान जरूर हैं, लेकिन देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान अब तक नहीं दिया गया है।

डॉ. मलिकराम ने कहा कि भारत रत्न किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे युग का सम्मान होता है। यदि मेजर ध्यानचंद को यह सम्मान दिया जाता है, तो यह उस भारत का सम्मान होगा जिसने गुलामी में भी विश्व विजय हासिल की थी। उन्होंने उम्मीद जताई कि भारत सरकार जल्द ही इस ऐतिहासिक भूल को सुधारते हुए मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न से सम्मानित करेगी।

उन्होंने कहा कि जिस दिन मेजर ध्यानचंद का नाम भारत रत्न की सूची में शामिल होगा, उस दिन देश गर्व से कह सकेगा कि भारत अपने महान नायकों को कभी नहीं भूलता।

 

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