हिंदू धर्म में भगवान शिव को देवों के देव महादेव कहा गया है। मान्यता है कि उनके दर्शन मात्र से ही भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। धर्म, अध्यात्म और भक्ति की भूमि काशी का भगवान शिव से विशेष संबंध है, इसी कारण इसे शिव की नगरी भी कहा जाता है। कहा जाता है कि काशी स्वयं भगवान शिव के त्रिशूल पर स्थित है और वही त्रिशूल हर संकट से नगर की रक्षा करता है। काशी में भगवान शिव के असंख्य प्राचीन मंदिर हैं, लेकिन यहां एक ऐसा अद्भुत मंदिर भी है, जहां स्वयं भगवान शिव के नहीं बल्कि उनके पिता के दर्शन होते हैं।
पिता महेश्वर शिवलिंग का रहस्य
काशी की तंग गलियों में स्थित शीतला गली में भगवान शिव के पिता स्वरूप शिवलिंग ‘पिता महेश्वर’ विराजमान हैं। यह शिवलिंग जमीन से करीब 40 फीट नीचे एक सुरंग के भीतर स्थापित है। दर्शन के समय ऐसा प्रतीत होता है मानो शिवलिंग पाताल लोक में स्थित हो। पूरे देश में यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहां भक्त शिवलिंग के सामने जाकर नहीं, बल्कि ऊपर बनी सुरंग के छिद्र से दर्शन करते हैं। इस शिवलिंग को भगवान शिव के पिता के स्वरूप में पूजा जाता है।
साल में केवल एक दिन खुलता है मंदिर
इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यह साल में सिर्फ एक दिन, महाशिवरात्रि के अवसर पर ही खुलता है। भक्तों को मंदिर के भीतर प्रवेश की अनुमति नहीं होती और वे केवल सुरंग के छिद्र से ही दर्शन करते हैं। इसी छिद्र से जलाभिषेक, बिल्व पत्र अर्पण और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है।
पुजारियों के अनुसार मंदिर की दीवारों पर मौजूद प्राचीन निशान इसकी ऐतिहासिकता और प्राचीनता के प्रमाण हैं। जमीन से काफी नीचे स्थित होने के कारण मंदिर का गर्भगृह हमेशा ठंडा रहता है। मंदिर तक पहुंचने का मार्ग खतरनाक होने के कारण सुरक्षा की दृष्टि से साल में केवल एक बार ही दर्शन की अनुमति दी जाती है।
पितृ दोष निवारण की मान्यता
पितृ पक्ष के दौरान इस मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। मान्यता है कि पिता महेश्वर शिवलिंग के दर्शन से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और पितृ दोष से मुक्ति मिलती है। यहां दो शिवलिंग हैं—एक ‘पिता महेश्वर’, जिन्हें भगवान शिव का पिता माना जाता है, और दूसरा ‘पर पिता महेश्वर’, जिन्हें उनका दादा माना जाता है।
‘पर पिता महेश्वर’ गहराई में स्थित एक गुप्त मंदिर है, जहां बहुत कम लोग पूजा करते हैं। स्थानीय मान्यता है कि उनका स्वभाव उग्र है और वे नियमित पूजा पसंद नहीं करते, इसलिए उनकी पूजा केवल पुजारी द्वारा ही की जाती है।
पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए थे, तब न तो बनारस शहर था और न ही गंगा नदी का वर्तमान स्वरूप। देवता बाबा विश्वनाथ के दर्शन के लिए वहां आए, लेकिन भगवान शिव को अपने पिता का वहां न होना खला। इसके बाद भगवान शिव के आह्वान पर पिता महेश्वर उस पवित्र स्थान पर प्रकट हुए।
हालांकि किसी भी पुराण में भगवान शिव के परिवार का स्पष्ट वर्णन नहीं मिलता, क्योंकि उन्हें ही सृष्टि का पालनकर्ता और संहारक माना गया है। आज तक कोई भी भगवान शिव के आदि और अंत का पता नहीं लगा पाया है।
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