देखो मोदी का कमाल: बंसी लाल देवीलाल और भजन लाल के राजघराने से कुर्सी छीन कर नायब सैनी को सौंपी
जो खुद को अपरिहार्य समझ बैठे थे, मोदी युग ने उन्हें लाइन में खड़ा कर दिया।
गुस्ताखी माफ़ हरियाणा – पवन कुमार बंसल
(हमारे जागरूक पाठक महेश कौशिक, रोहतक के सौजन्य से)
मोदी ने खोदी गोभी—
राजघरानों से लेकर अपनों तक की सत्ता से निकाली मरोड़।
सत्ता नहीं, अब संगठन चलेगा।
जो खुद को अपरिहार्य समझ बैठे थे, मोदी युग ने उन्हें लाइन में खड़ा कर दिया।
कभी सत्ता के आसपास भी न दिखने वाली भारतीय जनता पार्टी ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हरियाणा में न केवल विपक्ष की राजनीतिक मरोड़ निकाली, बल्कि अपने ही घर के उन नेताओं को भी सीधी लाइन में खड़ा कर दिया, जो खुद को पार्टी से बड़ा समझने लगे थे। मोदी युग ने यह साफ कर दिया कि अब राजनीति वंश, विरासत या रसूख से नहीं, बल्कि संगठन और जनसेवा से चलेगी।
मोदी की लहर ने गांधी परिवार ही नहीं, बल्कि उन तमाम राजघरानों की कमर तोड़ दी, जो दशकों तक केंद्र और राज्यों की सत्ता के स्थायी केंद्र बने रहे। मोदी का विजयी अश्वमेघ का घोड़ा ऐसा खुला कि कुछ सियासी घराने दबे पांव भाजपा में आकर शरणागत हो गए और जो नहीं आए, उनकी राजनीतिक जमीन ही खिसक गई।
यह बदलाव केवल विपक्ष तक सीमित नहीं रहा। मोदी ने अपनी ही पार्टी के भीतर ऊँची आँख दिखाने वालों को भी स्पष्ट संदेश दिया—भाजपा में पद स्थायी नहीं, जवाबदेही स्थायी है। जो जनसेवा नहीं करेगा, उसके लिए पार्टी में कोई जगह नहीं। कई बार मुख्यमंत्री रह चुके नेताओं को केंद्र में भेजकर प्रदेश की राजनीति से मुक्त करना और नई पीढ़ी को कमान सौंपना इसी रणनीति का हिस्सा रहा।
हरियाणा इस प्रयोग की प्रयोगशाला बन गया। हरियाणा के चर्चित ‘लालों’ को प्रदेश की निर्णायक राजनीति से बाहर करना और करीब सौ साल से सत्ता के गलियारों में जमी हुड्डा परिवार की पकड़ को कमजोर करना किसी राजनीतिक भूकंप से कम नहीं था। जाट समाज की परंपरागत मुख्यमंत्री कुर्सी पर पंजाबी और ओबीसी नेतृत्व को बैठाना भाजपा का ऐसा मास्टर स्ट्रोक रहा, जिसने सामाजिक और राजनीतिक गणित दोनों बदल दिए।
हरियाणा भाजपा में आज अगर किसी एक चेहरे को प्रभावशाली माना जाता है, तो वह अहीरवाल क्षेत्र के राव इंदरजीत सिंह हैं। सांसद, बेटी विधायक और मंत्री—सब कुछ होने के बावजूद मोदी युग में किसी को भी खुली उड़ान की इजाजत नहीं है। अहीरवाल में भाजपा ऐसा कैडर गढ़ रही है कि आने वाले समय में व्यक्ति संगठन पर नहीं, संगठन व्यक्ति पर भारी पड़ेगा।
2014 में मनोहर लाल को मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा पहले ही साफ कर चुकी थी कि यहां नेता नहीं, सेवक चाहिए। रामबिलास शर्मा, कैप्टन अभिमन्यु और ओमप्रकाश धनखड़ जैसे नेता, जो कभी मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे, आज हाशिये पर हैं। यह बताने के लिए काफी है कि मोदी युग में महत्वाकांक्षा नहीं, अनुशासन चलता है।
मोदी ने राजनीति की परिभाषा बदल दी है—यहां न राजघराना चलता है, न रुतबा। चलता है तो सिर्फ संगठन, समर्पण और सेवा।
