प्रेमानंद महाराज का सत्संग: अशुभ प्रारब्ध को भोगना ही पड़ता है, नाम-जप से भी नहीं बदलती नियति का यह हिस्सा

एकांतिक वार्तालाप के दौरान संत प्रेमानंद महाराज से एक महिला भक्त ने प्रश्न किया कि नियति का वह कौन-सा भाग है जिसे नाम-जप, साधना या किसी भी उपाय से बदला नहीं जा सकता और जिसे मनुष्य को हर हाल में भोगना ही पड़ता है। इस प्रश्न का उत्तर देते हुए प्रेमानंद महाराज ने नियति और प्रारब्ध के गूढ़ रहस्य को सरल शब्दों में समझाया।

प्रेमानंद महाराज ने कहा कि नियति का वह हिस्सा अशुभ प्रारब्ध भोग कहलाता है, जिसे बदला नहीं जा सकता। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि जैसे उनकी स्वयं की किडनी की बीमारी। उन्होंने स्पष्ट कहा कि किडनी फेल होने की स्थिति को अब बदला नहीं जा सकता, यह उनके प्रारब्ध का हिस्सा है, जिसे उन्हें भोगना ही पड़ेगा।

संत ने कहा कि जो शुभ या अशुभ कर्म प्रारब्ध बन चुके होते हैं, उनका फल अवश्य भोगना पड़ता है। इसलिए मनुष्य को बहुत समझदारी से जीवन जीना चाहिए। यदि कोई पाप कर्म हो जाए तो उसे प्रारब्ध बनने से पहले ही नष्ट करने का प्रयास करना चाहिए। विद्वानों और संतों की सलाह लेकर प्रायश्चित और साधना के माध्यम से पाप कर्मों का क्षय किया जा सकता है, लेकिन एक बार जब वे प्रारब्ध बन जाते हैं, तब उनसे मुक्ति संभव नहीं रहती।

प्रेमानंद महाराज ने आगे कहा कि अशुभ कर्म जब प्रारब्ध बन जाते हैं, तो वे बीमारी, कष्ट और अनेक प्रकार की परेशानियों के रूप में लौटकर आते हैं। इससे बड़े-बड़े संत और महात्मा भी नहीं बच पाते। जो लोग नियमित भजन-कीर्तन करते हैं, उन्हें भी अपने प्रारब्ध का फल भोगना पड़ता है। इसलिए जब तक कर्म प्रारब्ध नहीं बनता, तब तक उसे नष्ट किया जा सकता है, लेकिन उसके बाद केवल भोग ही शेष रहता है।

एक अन्य भक्त ने सवाल किया कि जब हर जगह भगवान का वास है, तो फिर समाज और परिवार में झूठ, कपट और स्वार्थ क्यों दिखाई देता है? सच्चाई का विरोध और अच्छाई का उपहास क्यों होता है? इस पर प्रेमानंद महाराज ने कहा कि यह कलियुग का स्वभाव है।

उन्होंने एक कथा सुनाते हुए कहा कि जब ब्रह्मा जी ने सतयुग से नर्क के बारे में कहा तो सतयुग ने उत्तर दिया कि हमारे रहते कोई नर्क नहीं जाएगा। त्रेतायुग ने भी सतयुग जैसा आचरण रखने की बात कही, द्वापर ने आज्ञा पालन का प्रयास करने का वचन दिया, लेकिन जब कलियुग से यही बात कही गई तो उसने उत्तर दिया कि जैसे सतयुग में कोई नर्क नहीं जाएगा, वैसे ही कलियुग में कोई स्वर्ग नहीं जाएगा, क्योंकि इस युग में वे सभी बुराइयां हैं जो नर्क की ओर ले जाती हैं।

प्रेमानंद महाराज ने कहा कि कलियुग जैसा है वैसा ही रहेगा, लेकिन मनुष्य को चाहिए कि वह धर्म और सत्य के मार्ग से न हटे। चाहे लोग उपहास करें या आलोचना करें, लेकिन यह विश्वास रखें कि भगवान सदैव सत्य के साथ खड़े होते हैं। मनुष्य जीवन की महत्ता को समझते हुए सही आचरण बनाए रखना ही सच्ची साधना है।

डिस्क्लेमर- यहां दी गई जानकारियां सामाजिक और धार्मिक आस्थाओं पर आधारित हैं। khabrejunction.com इनकी पुष्टि नहीं करता।

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