Ramayan Katha: रावण पूर्व जन्म में था भगवान विष्णु का सेवक, जानिए क्यों लेना पड़ा राक्षस योनि में जन्म

Ramayan Katha:
रामायण की कथा में रावण को लंका का राजा और एक शक्तिशाली राक्षस बताया गया है। वह शिवभक्त, महापंडित और महान विद्वान था, लेकिन उसका अहंकार ही उसके पतन का कारण बना। बहुत कम लोग जानते हैं कि रावण पूर्व जन्म में भगवान विष्णु का सेवक था। फिर भी उसे राक्षस योनि में जन्म क्यों लेना पड़ा, इसके पीछे एक रोचक कथा जुड़ी हुई है।

पूर्व जन्म में कौन था रावण?

धर्मग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु के वैकुंठ धाम में दो द्वारपाल थे—जय और विजय। यही अगले जन्मों में राक्षस योनि में जन्म लेकर पहले हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष, फिर रावण और कुंभकरण, और अंत में शिशुपाल और दंतव्रक बने।

श्राप के कारण धरती पर जन्म

एक बार सनक, सनंदन जैसे चार कुमार ऋषि भगवान विष्णु के दर्शन के लिए वैकुंठ पहुंचे। लेकिन जय और विजय ने उन्हें प्रवेश से रोक दिया। इसे अपमान मानकर ऋषियों ने उन्हें श्राप दिया कि वे तीन जन्मों तक धरती पर असुर योनि में जन्म लेंगे।

क्षमा याचना और मुक्ति का मार्ग

श्राप के बाद जय और विजय ने क्षमा मांगी। तब ऋषियों ने कहा कि श्राप तो वापस नहीं होगा, लेकिन हर जन्म में तुम्हारी मृत्यु भगवान विष्णु के हाथों होगी। तीसरे जन्म के बाद तुम्हें मोक्ष प्राप्त होगा।

रावण का तीन जन्मों का चक्र

पहला जन्म: हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष, जिन्हें भगवान विष्णु ने नरसिंह और वराह अवतार में मारा।

दूसरा जन्म: रावण और कुंभकरण, जिनका अंत श्रीराम के हाथों हुआ।

तीसरा जन्म: शिशुपाल और दंतव्रक, जिन्हें श्रीकृष्ण ने युद्ध में पराजित किया।

तीनों जन्म पूरे होने के बाद जय और विजय को पुनः विष्णु धाम में स्थान मिला।

डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और पुराणों पर आधारित है। khabrejunction.com इसकी पुष्टि नही करता है।

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