- रिपोर्ट- मनोज कुमार यादव
एटा आजकल दावतों, शादियों और धार्मिक आयोजनों में जिस तरह थर्माकोल की पत्तलें और गिलास लोगों की पहली पसन्द बनती जा रही हैं, यह केवल परम्परा और संस्कृति पर चोट नहीं है बल्कि हमारे स्वास्थ्य और पर्यावरण पर भी गम्भीर संकट है। पहले गाँव-गाँव में पेड़ के पत्तों से बनी पत्तलें और दोने प्रयोग होते थे, जो प्राकृतिक, सस्ते और पर्यावरण के अनुकूल होते थे। भोजन करने के बाद ये पत्तलें आसानी से गलकर मिट्टी में मिल जाती थीं और पशुओं के लिए भी अहानिकारक नहीं थीं।
इसके विपरीत थर्माकोल की पत्तलें प्लास्टिक आधारित रसायनों से बनी होती हैं, जिनमें गर्म खाना परोसने से हानिकारक रसायन भोजन में मिल जाते हैं। यह रसायन धीरे-धीरे शरीर में पहुँचकर कैंसर, पेट की बीमारियाँ, हार्मोनल असन्तुलन और साँस की समस्याओं तक का कारण बन सकते हैं। दूसरी ओर थर्माकोल कचरे के रूप में सदियों तक नष्ट नहीं होता, जिससे भूमि और जल प्रदूषण बढ़ता है। नालियों और नालों में जमा होकर यह जलभराव और गन्दगी फैलाता है, जबकि जलाने पर जहरीली गैसें वातावरण में फैलाकर प्रदूषण को कई गुना बढ़ा देती हैं।
विडम्बना यह है कि सुविधा और दिखावे की दौड़ में लोग पत्तलों से दूर होकर थर्माकोल का अन्धाधुन्ध प्रयोग कर रहे हैं। यह प्रवृत्ति न केवल हमारे स्वास्थ्य बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को भी खतरे में डाल रही है। अतः आवश्यकता है कि थर्माकोल पर कड़ा प्रतिबन्ध लगे और लोग स्वयं जागरूक होकर फिर से पत्तल, दोना और मिट्टी के बर्तनों की ओर लौटें। यही हमारी संस्कृति, स्वास्थ्य और पर्यावरण की रक्षा का सच्चा रास्ता है।
