एटा: किसानों का सहारा बनी सहकारी समितियां

  • रिपोर्ट – मनोज कुमार यादव

एटा जनपद में इस समय सबसे बड़ा संकट किसानों के सामने खाद का अभाव बनकर खड़ा है। प्राईवेट खाद की दुकानों की स्थिति यह है कि या तो उनके गोदाम खाली पड़े हैं, या यदि खाद उपलब्ध भी है तो किसानों को निर्धारित मूल्य से कहीं अधिक दाम पर बेची जा रही है। यह स्थिति न केवल किसान की जेब पर बोझ डाल रही है, बल्कि उनके परिश्रम और धैर्य की खुली लूट भी है। खेती की रीढ़ कहे जाने वाले खाद के अभाव ने किसान की नींद हराम कर दी है।

ऐसे समय में सहकारी समितियां किसानों का वास्तविक सहारा बनकर सामने आई हैं। समितियों पर खाद वितरण का काम पूरी ईमानदारी और नियमबद्ध तरीके से किया जा रहा है। यही कारण है कि किसानों की भारी भीड़ समितियों के बाहर सुबह से ही उमड़ने लगती है। समितियों के अधिकारी और कर्मचारी बिना किसी दिखावे के कड़ी मेहनत कर रहे हैं, और यह दिखा रहे हैं कि यदि प्रशासनिक तंत्र ईमानदारी से काम करे तो हर संकट का समाधान संभव है।

हालांकि भीड़ और अव्यवस्था के कारण कभी-कभी दिक्कतें जरूर उत्पन्न होती हैं, लेकिन यह जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारी कर्मचारियों की मेहनत को कमतर नहीं कर सकतीं। जब निजी व्यापारी मुनाफाखोरी में डूबकर किसानों को लूटने में लगे हों, तब सरकारी सहकारी समितियां किसानों का हाथ थामकर राहत पहुँचा रही हैं।

आज आवश्यकता है कि प्रशासन इस समस्या की जड़ तक जाए और उन निजी दुकानदारों पर कड़ी कार्रवाई करे, जो संकट की घड़ी में किसानों का शोषण कर रहे हैं। साथ ही, समितियों की क्षमता बढ़ाई जाए ताकि और अधिक किसानों को राहत मिल सके।

किसान की मजबूरी का फायदा उठाना सबसे बड़ा अपराध है। खाद के बिना फसल असंभव है और फसल के बिना किसान का अस्तित्व ही खतरे में है। इसलिए खाद की किल्लत को किसी भी कीमत पर हल करना सरकार और प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।

AR सतीश कुमार जी ने बताया कि जनपद एटा की 68 सहकारी समितियां और 90 कृभको सेंटर हैं जहां एक या दो वितरण केंद्र को छोड़ सभी समितियों पर खाद वितरित हो रही है। इस समय सहकारी समितियां ही किसानों के लिए संबल बनी हुई हैं। यह उदाहरण साफ है कि जब जिम्मेदारी, ईमानदारी और मेहनत एक साथ मिलते हैं, तो जनता का भरोसा प्रशासन पर कायम होता है। किसानों के संघर्ष और सहकारिता की मेहनत ही इस संकट से बाहर निकलने का मार्ग प्रशस्त करेंगी।

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