- रिपोर्ट – मनोज कुमार यादव
एटा: सुबह की पहली किरण फूटने से पहले ही हमारे गांवों-कस्बों की सहकारी समितियों के बाहर लंबी-लंबी लाइनें लग जाती हैं। इन लाइनों में सबसे अधिक नजर आते हैं किसान, जिनकी मेहनत से अन्न की बालियां लहलहाती हैं और देश की भूख मिटती है। सुबह पाँच बजे से शुरू हुआ इंतजार कई बार दोपहर तक भी खत्म नहीं होता, और तब भी यह तय नहीं होता कि उन्हें खाद मिल पाएगी या नहीं।
सबसे पीड़ादायक दृश्य तब होता है जब महिलाएं अपने छोटे-छोटे बच्चों को घर पर भूखा-प्यासा छोड़कर खाद की लाइन में खड़ी नजर आती हैं कभी कभी इन अन्नदाताओं को समिति के कर्मचारियों की भली बुरी बातें भी सुननी पड़ती हैं । यह तस्वीरें न केवल किसानों की मजबूरी बयां करती हैं, बल्कि व्यवस्था की पोल भी खोल देती हैं। सरकार और प्रशासन बड़ी-बड़ी घोषणाओं में ‘अच्छे दिन’ लाने का दावा करते हैं, लेकिन किसानों की यह विवशता उन दावों पर सवालिया निशान खड़ा कर रही है।
दरअसल, खाद किसानों के लिए उतनी ही जरूरी है जितनी पानी और हवा। लेकिन आज वही खाद उनके लिए संघर्ष और अपमान का कारण बन गई है। खुले बाजार में कालाबाजारी और समितियों पर कुप्रबंधन ने किसानों की परेशानी को और बढ़ा दिया है। किसान घंटों लाइन में खड़े रहकर भी मायूस लौटने को मजबूर हैं।
क्या यही वह अच्छे दिन हैं जिनका सपना दिखाया गया था? जब अन्नदाता को ही अपने खेत के लिए खाद के लिए धक्के खाने पड़ें, जब महिलाएं घर की जिम्मेदारियां छोड़कर समितियों पर संघर्ष करें, तब यह व्यवस्था किसान हितैषी कैसे कही जा सकती है?
समय की मांग है कि सरकार और प्रशासन इस गंभीर समस्या पर तत्काल ठोस कदम उठाए। खाद की आपूर्ति समय पर और पर्याप्त मात्रा में सुनिश्चित की जाए। समितियों की कार्यप्रणाली पर सख्त निगरानी रखी जाए और किसानों को राहत दी जाए। क्योंकि अगर किसान ही परेशान और हताश हो जाएगा तो देश की खाद्य सुरक्षा पर भी प्रश्नचिह्न लगना तय है।
अन्नदाता का सम्मान केवल भाषणों में नहीं, बल्कि उनके जीवन में सहजता और सुविधाओं के रूप में झलकना चाहिए। वरना किसान की यह लंबी लाइनें सत्ता के दावों और अच्छे दिनों की हकीकत को हमेशा चुनौती देती रहेंगी।
