- रिपोर्ट – मनोज कुमार यादव
उत्तर प्रदेश में विद्युत विभाग ने बिजली मापने की तकनीक को लेकर कई चरण पार कर लिए। पहले थे पुराने एनालॉग मीटर, फिर आए डिजिटल मीटर, और अब “स्मार्ट” मीटर। नाम सुनकर लगता है कि अब तो बिजली व्यवस्था भी स्मार्ट हो जाएगी—बिल सही समय पर आएंगे, मीटर रीडिंग में गड़बड़ी नहीं होगी, बिजली सही मिलेगी और उपभोक्ताओं को पारदर्शी सुविधा मिलेगी। लेकिन हकीकत में स्मार्ट सिर्फ मीटर है, सिस्टम वही पुराना है।
स्मार्ट मीटर से ऑनलाइन बिलिंग, तुरंत रीडिंग, और बिना लाइनमैन के खपत का हिसाब देने की क्षमता है, मगर विभाग की कार्यशैली और जवाबदेही में कोई बदलाव नहीं दिखता। उपभोक्ताओं को आज भी बिल में ग़लत रीडिंग, बेवजह चार्ज, और शिकायत पर हफ्तों इंतजार का सामना करना पड़ता है। मीटर तो स्मार्ट हो गया, पर जिस व्यवस्था से वह जुड़ा है, वह अब भी पुराने ढर्रे पर चल रही है।
असल सवाल यह है कि जब तक बिलिंग, शिकायत निवारण, और जवाबदेही की प्रक्रिया “स्मार्ट” नहीं होगी, तब तक तकनीक के नाम पर खर्च किया गया करोड़ों रुपया जनता की जेब पर बोझ ही रहेगा। स्मार्ट मीटर का असली मकसद तभी पूरा होगा, जब स्मार्टनेस मीटर से निकलकर पूरे सिस्टम में आए। वरना यह बदलाव सिर्फ दिखावे का एक और चमकदार मुखौटा बनकर रह जाएगा।
