- रिपोर्ट: मनोज कुमार यादव
भारत एक धर्मप्रधान देश है, जहाँ भगवान राम और भगवान श्रीकृष्ण केवल पौराणिक पात्र नहीं, बल्कि जनमानस के आराध्य हैं। उनकी कथा कहना न केवल पुण्य माना जाता है, बल्कि समाज में धर्म, मर्यादा और प्रेम के संदेश का प्रचार भी है। लेकिन आज जब हम वर्तमान समय की ओर देखते हैं, तो एक बड़ा सवाल खड़ा होता है — क्या राम-कृष्ण की कथा कहना भक्ति है या एक सुनियोजित व्यापार?
पुराने समय में संत, मुनि या कथावाचक नि:स्वार्थ भाव से कथा कहते थे। उद्देश्य होता था—धर्म का प्रचार, जनमानस में सद्भावना का प्रसार और आत्मिक उन्नति। वे कथा कहने के बदले कोई शुल्क नहीं लेते थे, बल्कि लोग प्रेमवश जो भी अर्पण करते, उसी में संतोष करते थे।
परंतु आज हालात कुछ और हैं—
कथा कहने वाले कथावाचकों की फीस तय होती है, जो कभी-कभी फिल्मों के सितारों से भी अधिक होती है।
कथा के मंच अब भक्ति की जगह शोहरत, भीड़ और सोशल मीडिया लाइक्स का साधन बनते जा रहे हैं।
कई कथावाचक अपने कार्यक्रमों में VIP व्यवस्था, AC पंडाल, आलीशान स्टेज, और विशेष दानदाता वर्ग को प्रमुखता देते हैं।
यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि राम-कृष्ण की कथाएं अब “इवेंट” बन गई हैं। कई स्थानों पर कथा से अधिक आयोजन का प्रचार होता है। कथा के नाम पर चंदा इकट्ठा किया जाता है, VIP दानदाताओं की सूची तैयार होती है, और कई बार तो आयोजनों का पूरा उद्देश्य सिर्फ “नाम कमाना” या “कमाई करना” हो जाता है।
आज भी कई संत, कथावाचक और साधुजन ऐसे हैं जो सच्चे मन से रामकथा या श्रीमद्भागवत कथा कहते हैं, जिनका उद्देश्य केवल भक्ति, सेवा और आध्यात्मिक जागरण होता है। वे कथा को प्रचार का माध्यम नहीं, प्रभु से मिलने का साधन मानते हैं।
राम और कृष्ण की कथा कहना कोई अपराध नहीं, न ही उस पर कमाई करना गलत है जब तक उद्देश्य पवित्र हो। परंतु जब कथा धार्मिक आस्था से हटकर केवल पैसे और प्रसिद्धि का जरिया बन जाए, तब यह धर्म नहीं, व्यवसाय बन जाता है। कथा का सार तभी सार्थक है जब वह जनमानस को जोड़ने, सुधारने और प्रभु से जोड़ने का माध्यम बने, न कि सिर्फ मुनाफा कमाने का।
“कथा वही जो राम को हृदय में बसाए, और प्रवचन वही जो कृष्ण की लीला में भक्ति जगाए।”
