बिहार में आधी आबादी वोट देने के अधिकार से वंचित हो सकती है: ADR के जगदीप छोकर ने EC की मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया पर उठाए सवाल
बिहार में चुनाव आयोग की ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ पर मचा सियासी घमासान
पटना: बिहार में चुनाव आयोग (EC) द्वारा शुरू की गई विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) प्रक्रिया ने एक बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने इस प्रक्रिया को ‘रिगिंग की साजिश’ बताया है और आरोप लगाया है कि यह कार्य सत्तारूढ़ सरकार के इशारे पर किया जा रहा है।
जगदीप छोकर ने बताया SIR को गैरकानूनी और असंवैधानिक
ADR (एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स) के सह-संस्थापक जगदीप छोकर, जो सुप्रीम कोर्ट में SIR के खिलाफ याचिकाकर्ता हैं, का कहना है कि यह प्रक्रिया न केवल अवैध है बल्कि व्यावहारिक रूप से असंभव भी है। उन्होंने कहा, “अगर SIR को अभी नहीं रोका गया, तो बिहार की आधी आबादी वोटिंग के अधिकार से वंचित हो सकती है।”
नियमों का उल्लंघन: बिना नोटिस नाम हटाना गैरकानूनी
EC के 24 जून 2025 के नोटिफिकेशन के अनुसार, 1 जनवरी 2003 से पहले मतदाता सूची में शामिल लोगों को नागरिक माना गया है, जबकि उसके बाद जोड़े गए लोगों को नहीं। छोकर ने कहा कि:
- 1 जनवरी 2003 से 23 जून 2025 तक जो भी नाम मतदाता सूची में जोड़े गए थे, उन्हें बिना कानूनी प्रक्रिया के हटा दिया गया।
- “रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्ट्रर्स रूल्स, 1960” और “रिप्रजेंटेशन ऑफ पीपुल्स एक्ट, 1951” के तहत, किसी का नाम हटाने से पहले व्यक्तिगत नोटिस और सुनवाई अनिवार्य है।
नागरिकता प्रमाणन प्रक्रिया में अवैध बदलाव
अब तक, Form VI में नागरिकता प्रमाण के लिए जन्मतिथि और दस्तावेज मांगे जाते थे (जैसे आधार)।
लेकिन EC के नए आदेश में नया घोषणापत्र (Declaration) मांगा गया है, जो वोटर की पात्रता के लिए एक नई शर्त बनाता है — यह अधिकार गृह मंत्रालय का है, EC का नहीं।
तेजी से हो रही प्रक्रिया पर उठे सवाल
छोकर ने सवाल उठाया कि “EC ने 25 जून से यह प्रक्रिया शुरू की और एक महीने में पूरी करने की योजना है। एक BLO को हर मतदाता के घर दो बार जाना होता है। क्या यह एक महीने में संभव है?”
प्रवासी आबादी के लिए बना असंभव कार्य
बिहार के 30–40% लोग प्रवासी मजदूर हैं। छोकर ने कहा, “क्या पंजाब में खेतों और मुंबई की निर्माण साइटों पर काम करने वाले मजदूर EC की वेबसाइट से फॉर्म डाउनलोड करके अपलोड कर पाएंगे?”
बिहार के CEO ने कहा कि सिर्फ आधार ही पर्याप्त है, लेकिन EC के 6 जुलाई के प्रेस नोट में कहा गया कि 25 जुलाई तक अन्य दस्तावेज भी जमा किए जा सकते हैं, जिससे स्पष्ट विरोधाभास सामने आया।
क्या यह वोटबंदी है?
CPI(ML) प्रमुख ने इस प्रक्रिया को “वोटबंदी” करार दिया है। वहीं, EC ने कहा कि सभी मान्यता प्राप्त पार्टियों को बातचीत के लिए बुलाया गया था और कोई भी वर्तमान मतदाता सूची से संतुष्ट नहीं था।
ADR की याचिका: प्रक्रिया पर रोक लगाई जाए
ADR ने सुप्रीम कोर्ट में प्रार्थना की है कि SIR को पूर्ण रूप से रोका जाए। छोकर कहते हैं, “अगर यह प्रक्रिया जारी रही, तो चुनावी व्यवस्था बाधित होगी, लाखों लोग वोट देने से वंचित रहेंगे और नागरिकता साबित न कर पाने पर उन्हें निर्वासित भी किया जा सकता है, जो बेहद खतरनाक है।”
10 जुलाई को होगी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर 10 जुलाई को सुनवाई करेगा। तब तक बिहार की राजनीति और नागरिक अधिकारों को लेकर बहस और गहराने की संभावना है।
